मंथन से मार्गदर्शन तक


मंथन से मार्गदर्शन तक :-
संदीप कुमार दुबे
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय, भारत
चेयरमैन, छठी मैया फाउंडेशन

जीवन में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो हमें केवल रास्ता नहीं बताते, बल्कि हमारे भीतर रास्ता खोजने की दृष्टि पैदा करते हैं। मेरे जीवन में श्री सतीश उपाध्याय जी का स्थान ऐसे ही गुरु और मार्गदर्शक का है। उन्होंने मुझे कोई तैयार मंजिल नहीं दी, बल्कि एक छोटा-सा मंत्र दिया—“मंथन करो।” आज जब मैं अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि मेरे कई बड़े संकल्पों का पहला बीज इसी एक शब्द में छिपा था।

सतीश उपाध्याय जी दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष रहे। उनके व्यक्तित्व में मैंने हमेशा संगठन, संवाद और समाज को साथ लेकर चलने की भावना देखी। मेरे लिए विशेष गौरव की बात यह भी है कि उनका छठ महापर्व से संबंध आज का नहीं है। वर्ष 2014 में उनके दिल्ली भाजपा अध्यक्ष रहते हुए छठ के अवसर पर सार्वजनिक अवकाश की मांग उठाई गई और उसी वर्ष दिल्ली में छठ पर सार्वजनिक अवकाश घोषित हुआ। वर्षों बाद भी दिल्ली भाजपा नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से उस पहल में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय जी की भूमिका को रेखांकित किया है।

मेरे लिए यह इतिहास इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि आगे चलकर छठ ही मेरे जीवन के एक बड़े सांस्कृतिक संकल्प का आधार बना।

जब मेरे मन में छठी मैया फाउंडेशन स्थापित करने का विचार आया, तो अपने मन की बात मैंने सबसे पहले अपने गुरु सतीश उपाध्याय जी के सामने रखी। मैंने उनसे कहा कि छठ केवल एक पर्व नहीं है; इसके भीतर प्रकृति, सूर्य, जल, परिवार, तप, सत्य और सामाजिक समरसता का ऐसा दर्शन है जिसे दुनिया के सामने ले जाने की आवश्यकता है।

उन्होंने मेरी बात सुनी और एक अत्यंत महत्वपूर्ण सलाह दी—बिहार और पूर्वांचल के लोगों से मिलो, समाज की बात सुनो और मंथन करो।

यही मेरे लिए वास्तविक मार्गदर्शन था।

मैं लोगों से मिला, संवाद किया और छठ को केवल अपनी श्रद्धा की दृष्टि से नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक सांस्कृतिक चेतना के रूप में समझने का प्रयास किया। धीरे-धीरे एक विचार संस्था में और संस्था एक बड़े सांस्कृतिक अभियान में परिवर्तित होने लगी।

इसी यात्रा में छठी मैया फाउंडेशन ने छठ महापर्व को UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की Representative List तक पहुँचाने की दिशा में अपना प्रस्ताव और प्रयास आगे बढ़ाया। इस पहल के संबंध में फाउंडेशन को आधिकारिक पत्र प्राप्त होना हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण था। फाउंडेशन को प्रवासी समुदायों से Community Consent Letters जुटाने जैसे कार्य से भी जोड़ा गया। मेरे लिए यह केवल एक पत्र नहीं था; यह उस छोटे से विचार के एक बड़े सांस्कृतिक अभियान में बदलने का प्रमाण था।

भारत सरकार ने भी इस दिशा में प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। संस्कृति मंत्रालय ने सितंबर 2025 में UAE, Suriname और Netherlands के राजनयिक प्रतिनिधियों के साथ छठ के बहुराष्ट्रीय UNESCO nomination पर विचार-विमर्श किया था। अब भारत सरकार ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की है कि छठ महापर्व का पूरा nomination dossier UNESCO को भेजा जा चुका है। यह नामांकन 2026-27 चक्र के लिए है और अंतिम inscription UNESCO की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होना है।

यदि छठ महापर्व UNESCO की Representative List of the Intangible Cultural Heritage of Humanity में अंकित होता है, तो यह करोड़ों छठ व्रतियों, माताओं, बहनों और इस परंपरा को पीढ़ियों से जीवित रखने वाले परिवारों का सम्मान होगा। छठी मैया फाउंडेशन के लिए भी यह यात्रा उसके इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक होगी।

इस पूरे अभियान में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व वाली भारत सरकार द्वारा छठ के UNESCO नामांकन को आगे बढ़ाया जाना मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से भी भावनात्मक विषय रहा है। इसी कृतज्ञता और श्रद्धा के भाव से मैंने वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के स्वास्थ्य, दीर्घायु और राष्ट्रसेवा की शक्ति के लिए छठ व्रत किया था। मेरा संकल्प है कि वर्ष 2026 में भी उनके स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के साथ छठ व्रत करूँगा।

मेरे लिए यह राजनीति से अधिक श्रद्धा और कृतज्ञता का विषय है। हमारी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए जब कोई सकारात्मक प्रयास होता है, तो उसके प्रति धन्यवाद व्यक्त करना भी भारतीय संस्कार का हिस्सा है।

इस यात्रा का अगला बड़ा पड़ाव ‘ छठी मैया महापुराण’ है। मेरा प्रयास है कि आने वाले वर्ष तक यह महाग्रंथ भी पूर्ण स्वरूप में समाज के सामने हो। इसमें केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि छठ का दर्शन, सूर्य और जल का संबंध, प्रकृति संरक्षण, परिवार, तप, सत्य, लोकपरंपरा और मानवता का संदेश भी समाहित हो।

कभी-कभी मैं स्वयं से पूछता हूँ—इतनी बड़ी यात्रा की शुरुआत आखिर कहाँ से हुई?

उत्तर मुझे फिर उसी पहले संवाद तक ले जाता है।

मेरे मन में एक विचार आया था। मैं अपने गुरु के पास गया था। उन्होंने मेरी बात सुनी थी और कहा था—“लोगों से मिलो, मंथन करो।”

आज उस मंथन से निकला विचार छठी मैया फाउंडेशन के रूप में आगे बढ़ रहा है। छठ का UNESCO nomination dossier विश्व मंच तक पहुँच चुका है। वैश्विक स्तर पर छठ की सांस्कृतिक पहचान को लेकर नई संभावनाएँ दिखाई दे रही हैं और ‘ छठी मैया महापुराण’ जैसे संकल्प आकार ले रहे हैं।

इसीलिए मेरे लिए सतीश उपाध्याय जी केवल राजनीतिक जीवन के वरिष्ठ नहीं, बल्कि मेरे गुरु हैं।

गुरु की सबसे बड़ी देन शायद यही होती है कि वह शिष्य को अपनी छाया में खड़ा रहने के लिए नहीं कहता, बल्कि उसे स्वयं चलने की दृष्टि देता है।

आज मुझे लगता है कि—

गुरु ने मंथन का मंत्र दिया,
मंथन ने मार्ग दिया,
मार्ग ने संकल्प दिया,
संकल्प ने संस्था को जन्म दिया,
और संस्था आज अपनी संस्कृति को विश्व मंच तक पहुँचाने की यात्रा में है।

छठी मैया फाउंडेशन से लेकर ‘ छठी मैया महापुराण’ तक मेरे जीवन में जो भी बड़े सांस्कृतिक संकल्प आकार ले रहे हैं, उनकी शुरुआत के उस पहले बीज के लिए मैं अपने गुरु श्री सतीश उपाध्याय जी के प्रति सदैव कृतज्ञ रहूँगा।

यह यात्रा, यह भावना और इसकी बड़ी शुरुआत—मेरे गुरु श्री सतीश उपाध्याय जी को समर्पित है।

लेखक:
संदीप कुमार दुबे
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय, भारत
चेयरमैन, छठी मैया फाउंडेशन  www.chhathconnect.com

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