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Showing posts from March, 2026

नई आध्यात्मिक चेतना है छठ” — संदीप दुबे

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“नई आध्यात्मिक चेतना है छठ” — संदीप दुबे “नई आध्यात्मिक चेतना है छठ” — यह विचार प्रख्यात अधिवक्ता संदीप कुमार दुबे द्वारा व्यक्त किया गया, जो छठ महापर्व के गहन आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व को दर्शाता है।   संदीप दुबे के अनुसार— छठ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जागरण है, जो व्यक्ति को सत्य के मार्ग पर चलने, प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होने, और अनुशासन व तप के माध्यम से आत्मशुद्धि की प्रेरणा देता है। छठ: चेतना का उत्सव उनका मानना है कि— छठ में डूबते और उगते सूर्य दोनों को अर्घ्य देकर जीवन के हर पक्ष को स्वीकार करना सिखाया जाता है।  यह पर्व समानता, संयम और समर्पण का जीवंत उदाहरण है।  एक नई दिशा  यह संदेश आज के समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें बताता है कि— वास्तविक आध्यात्मिकता बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और प्रकृति के साथ सामंजस्य में निहित है। “छठ एक पर्व नहीं, बल्कि एक नई आध्यात्मिक चेतना है” — यह विचार समाज को जोड़ने, जागरूक करने और आत्मिक उन्नति की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

सत्य का उत्सव छठ

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सत्य का उत्सव (जीवन, प्रकाश और पुनर्जन्म का सनातन संदेश)लेखक: संदीप कुमार दुबे, अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय “सूर्य डूबता नहीं — बस दिशा बदलता है। यही छठ का सत्य है, यही जीवन का रहस्य।”  छठ — जीवन की पूर्णता का प्रतीक छठ महापर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन केवल भोग या तप नहीं, बल्कि संतुलन, सत्य और समर्पण का पथ है। यह पर्व आरंभ से अंत तक एक अदृश्य यात्रा है — शरीर से आत्मा तक, अंधकार से प्रकाश तक, अहम् से अस्तित्व तक। हर व्रती जब अर्घ्य देता है, तो वह केवल सूर्य को नहीं, बल्कि अपने जीवन के सत्य को अर्पित करता है। “छठ हमें यह नहीं सिखाती कि ईश्वर कहाँ है, बल्कि यह सिखाती है — कि सत्य हमारे भीतर ही ईश्वर है।” संध्या और उषा — जीवन के दो छोर छठ का दर्शन अद्भुत है — यह सूर्य के अस्त और उदय दोनों को समान श्रद्धा से पूजता है। यह सिखाता है कि जीवन का हर अंत केवल एक नया आरंभ है। जैसे सूर्य अस्त होकर भी पुनः उगता है, वैसे ही सत्य कभी समाप्त नहीं होता — वह बस नए रूप में लौटता है। “अस्त सूर्य भी उदय का वचन देता है।” संध्या अर्घ्य हमें सिखाता है विनम्रता, और उषा अर्घ्य सिखाता है विश्वा...

नागरिक कर्तव्य और शिष्टाचार – एक सशक्त राष्ट्र की पहचान

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नागरिक कर्तव्य और शिष्टाचार – एक सशक्त राष्ट्र की पहचान किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या संसाधनों से नहीं मापी जाती, बल्कि उसके नागरिकों के कर्तव्यबोध और शिष्टाचार से भी आंकी जाती है। एक जागरूक, जिम्मेदार और संस्कारित नागरिक ही एक मजबूत और विकसित समाज की नींव रखता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश में नागरिकों के अधिकारों की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन कर्तव्यों और शिष्टाचार की बात उतनी प्रमुखता से नहीं की जाती। जबकि लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती तभी संभव है जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समान रूप से निभाएं। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को कई मौलिक अधिकार दिए हैं, परंतु इसके साथ ही कुछ मौलिक कर्तव्यों का भी उल्लेख किया गया है। संविधान का सम्मान करना, कानून का पालन करना, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा करना, पर्यावरण का संरक्षण करना तथा सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। दुर्भाग्य से आज समाज में कई बार यह देखा जाता है कि लोग अपने अधिकारों के प्रति तो सजग रहते हैं, पर कर्तव्यों के पालन मे...