नागरिक कर्तव्य और शिष्टाचार – एक सशक्त राष्ट्र की पहचान
नागरिक कर्तव्य और शिष्टाचार – एक सशक्त राष्ट्र की पहचान
किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या संसाधनों से नहीं मापी जाती, बल्कि उसके नागरिकों के कर्तव्यबोध और शिष्टाचार से भी आंकी जाती है। एक जागरूक, जिम्मेदार और संस्कारित नागरिक ही एक मजबूत और विकसित समाज की नींव रखता है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश में नागरिकों के अधिकारों की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन कर्तव्यों और शिष्टाचार की बात उतनी प्रमुखता से नहीं की जाती। जबकि लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती तभी संभव है जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समान रूप से निभाएं।
संविधान ने प्रत्येक नागरिक को कई मौलिक अधिकार दिए हैं, परंतु इसके साथ ही कुछ मौलिक कर्तव्यों का भी उल्लेख किया गया है। संविधान का सम्मान करना, कानून का पालन करना, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा करना, पर्यावरण का संरक्षण करना तथा सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
दुर्भाग्य से आज समाज में कई बार यह देखा जाता है कि लोग अपने अधिकारों के प्रति तो सजग रहते हैं, पर कर्तव्यों के पालन में लापरवाही कर देते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर अनुशासनहीनता, ट्रैफिक नियमों की अवहेलना, स्वच्छता के प्रति उदासीनता और सामाजिक मर्यादाओं की अनदेखी हमारे नागरिक संस्कारों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
शिष्टाचार केवल व्यक्तिगत व्यवहार का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संस्कृति का प्रतीक है। बड़ों का सम्मान करना, छोटे बच्चों के प्रति स्नेह रखना, सार्वजनिक स्थानों पर अनुशासन बनाए रखना, विनम्र भाषा का प्रयोग करना और दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना एक सभ्य समाज की पहचान है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर नागरिक कर्तव्यों और शिष्टाचार की शिक्षा को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं। जब हर नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होगा और शिष्टाचार का पालन करेगा, तभी एक सशक्त, समृद्ध और संस्कारित भारत का निर्माण संभव होगा।
अंततः यह समझना होगा कि राष्ट्र केवल सरकार से नहीं बनता, बल्कि उसके जागरूक और जिम्मेदार नागरिकों से बनता है। यदि प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों और शिष्टाचार को ईमानदारी से निभाए, तो भारत न केवल शक्तिशाली बल्कि आदर्श राष्ट्र के रूप में विश्व के सामने उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है।
— संदीप कुमार दुबे
अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
अध्यक्ष, छठी मैया फाउंडेशन
Comments
Post a Comment