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Showing posts from August, 2026

छठी मैया फाउंडेशन के संरक्षक श्री सतीश उपाध्याय जी के मार्गदर्शन में आगे बढ़ेगा सत्य, सेवा और संस्कार का अभियान

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छठी मैया फाउंडेशन के संरक्षक श्री सतीश उपाध्याय जी के मार्गदर्शन में आगे बढ़ेगा सत्य, सेवा और संस्कार का अभियान छठी मैया फाउंडेशन के अध्यक्ष श्री संदीप कुमार दुबे ने कहा कि माननीय श्री सतीश उपाध्याय जी का फाउंडेशन के संरक्षक के रूप में हमारे साथ जुड़ना हमारे लिए अत्यंत गौरव और प्रसन्नता का विषय है। उन्होंने कहा कि सतीश उपाध्याय जी सरल, सहज, अनुभवी और समाज के प्रति समर्पित व्यक्तित्व हैं। उनका लंबा सार्वजनिक जीवन, संगठनात्मक अनुभव और सामाजिक सरोकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता हम सभी के लिए प्रेरणादायी है। श्री दुबे ने कहा कि आज आवश्यकता है कि हमारी युवा पीढ़ी को सत्य, संस्कार, सेवा, अनुशासन और प्रकृति संरक्षण जैसे मूल्यों से जोड़ा जाए। छठ महापर्व इन सभी मूल्यों का अद्भुत संगम है। उन्होंने कहा, “छठ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सत्य, तपस्या, प्रकृति और मानवता की साधना है। हमारा प्रयास है कि छठी मैया के इस महान संदेश को भारत से विश्व तक पहुँचाया जाए और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचे।” श्री संदीप कुमार दुबे ने विश्वास व्यक्त किया कि सतीश उपाध्याय जी...

स्वतंत्रता का सच्चा अर्थ: घूस, जमाखोरी और कालाबाजारी से मुक्ति

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स्वतंत्रता का सच्चा अर्थ: घूस, जमाखोरी और कालाबाजारी से मुक्ति लेखक: संदीप कुमार दुबे 15 अगस्त 1947 केवल भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता का दिन नहीं, बल्कि यह उस महान संघर्ष की स्मृति है जिसमें अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर देश को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराया। सदियों की गुलामी और अंग्रेजी शासन के अत्याचारों के विरुद्ध भारतवासियों ने एकजुट होकर संघर्ष किया। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों ने अपने अदम्य साहस से स्वतंत्रता की ज्वाला को प्रज्वलित रखा, वहीं महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, पंडित जवाहरलाल नेहरू और असंख्य सत्याग्रहियों ने सत्य, अहिंसा और जनशक्ति के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को निर्णायक दिशा दी। अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। यह दिन हमारे लिए केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और संकल्प का दिन भी है। आज प्रश्न यह है कि क्या केवल विदेशी शासन से मुक्ति ही पूर्ण स्वतंत्रता है? यदि हमारे देश का कोई नागरिक अपने ही देशवासी का अधिकार घूस लेकर रोकता है, यदि कोई व्यक्ति आवश्यक वस्तुओं की...

छठी मैया फाउंडेशन ने "ग्लोबल छठ" वैश्विक अभियान की घोषणा की

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छठी मैया फाउंडेशन ने "ग्लोबल छठ" वैश्विक अभियान की घोषणा की नई दिल्ली, 12 अगस्त 2026। भारत की सांस्कृतिक विरासत और छठ महापर्व के वैश्विक मूल्यों को विश्वभर में पहुँचाने के उद्देश्य से छठी मैया फाउंडेशन ने "ग्लोबल छठ (Global Chhath)" नाम से एक अंतरराष्ट्रीय जन-जागरण अभियान प्रारंभ करने की घोषणा की है। फाउंडेशन के अध्यक्ष संदीप कुमार दुबे ने बताया कि यह अभियान केवल छठ महापर्व के प्रचार-प्रसार तक सीमित नहीं होगा, बल्कि प्रकृति संरक्षण, जलवायु जागरूकता, सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक समरसता और मानवता की एकता जैसे मूल्यों को विश्व स्तर पर स्थापित करने का प्रयास करेगा। उन्होंने कहा कि छठ महापर्व भारत का ऐसा लोकपर्व है जो किसी जाति, भाषा, क्षेत्र या देश की सीमाओं में बंधा नहीं है। यह मानवता को जोड़ने, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और सत्य, अनुशासन तथा सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। संदीप कुमार दुबे ने कहा कि "ग्लोबल छठ" अभियान के अंतर्गत विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीय समुदाय, सांस्कृतिक संस्थानों, शिक्षाविदों, पर्यावरण विशेष...

नील से बंजर हुई धरती पर लहलहाया था सत्याग्रह

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नील से बंजर हुई धरती पर लहलहाया था सत्याग्रह चंपारण : मिट्टी, इतिहास, सत्य और स्वाभिमान की धरती — संदीप कुमार दुबे चंपारण का नाम आते ही आज भारत के सामान्य इतिहास-बोध में सबसे पहले महात्मा गांधी और चंपारण सत्याग्रह की स्मृति उभरती है। यह स्वाभाविक भी है। वर्ष 1917 का चंपारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में वह निर्णायक क्षण था, जब एक साधारण किसान की पीड़ा ने महात्मा गांधी को उस धरती तक पहुंचाया और वहीं से सत्याग्रह भारतीय जन-आंदोलन की एक प्रभावशाली शक्ति बनकर सामने आया। लेकिन चंपारण की कहानी केवल गांधी से शुरू नहीं होती। गांधीजी स्वयं अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में स्वीकार करते हैं— «“मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि यहाँ आने से पहले मैं चंपारण का नाम तक नहीं जानता था। नील की खेती होती है, इसका खयाल भी नहीं के बराबर था।”» गांधीजी के लिए चंपारण उस समय एक अनजान भूभाग था, लेकिन चंपारण के लिए गांधी आने वाले समय में उसकी पहचान का अभिन्न हिस्सा बन गए। यह इतिहास का अद्भुत संयोग है—जिस व्यक्ति को चंपारण के बारे में बहुत कम जानकारी थी, उसी के आगमन ने चंपारण को विश्व इत...

रामराज्य और छठ: आदर्श समाज की ओर एक मार्ग

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  रामराज्य और छठ: आदर्श समाज की ओर एक मार्ग त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामराज्य केवल एक शासन व्यवस्था नहीं थी, बल्कि मानव जीवन के सर्वोच्च आदर्शों का प्रतीक था। आज भी जब किसी आदर्श समाज, न्यायपूर्ण शासन और सुखी जीवन की कल्पना की जाती है, तो रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है— "दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।" अर्थात रामराज्य में किसी भी व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक या सांसारिक कष्ट नहीं था। वहां के नागरिक सत्यवादी, मर्यादित, कर्तव्यनिष्ठ, परोपकारी और धर्मपरायण थे। समाज में ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट और अन्याय का कोई स्थान नहीं था। हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करता था और दूसरों के सुख-दुख को अपना मानता था। आज प्रश्न यह है कि क्या आधुनिक युग में रामराज्य की स्थापना संभव है? यदि हम रामराज्य के मूल तत्वों को समझें तो उत्तर है—हाँ। और इस दिशा में छठ महापर्व हमें एक महत्वपूर्ण मार्ग दिखाता है। छठ और रामराज्य का संबंध छठ महापर्व केवल एक धार्मिक अनुष...

हे भगवान, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे केवल आपका प्रेम चाहिए।

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भक्ति मुक्ति के लिए नहीं, भगवान के प्रति निष्काम प्रेम के लिए है -हे भगवान, मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे केवल आपका प्रेम चाहिए।” मनुष्य भगवान के पास प्रायः अपनी इच्छाएँ लेकर जाता है। संकट हो तो भगवान याद आते हैं, इच्छा हो तो प्रार्थना होती है और समस्या समाप्त हो जाए तो हम समझते हैं कि भगवान ने हमारी सुन ली। लेकिन क्या भगवान के प्रति हमारा प्रेम केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति तक सीमित है? काकभुशुण्डि और गरुड़ जी के संवाद का गहरा आध्यात्मिक संदेश हमें बताता है कि भक्ति कोई सौदा नहीं है। भक्ति भगवान से कुछ प्राप्त करने का साधन मात्र नहीं, बल्कि भगवान के प्रति निष्काम प्रेम की अवस्था है। और इस सत्य को यदि किसी ने अपने जीवन में सबसे सुंदर ढंग से जिया, तो वे हैं—मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम। राम का वनवास: भक्ति और समर्पण की परीक्षा श्रीराम के जीवन में वनवास एक ऐसा प्रसंग है, जहाँ सामान्य मनुष्य के लिए सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है— जिस व्यक्ति का राज्याभिषेक होने वाला था, उसे अचानक चौदह वर्ष के वनवास का आदेश मिलता है। न राज्य का सुख। न राजसिंहासन। न राजमहल। इसके स्थान पर वन का कठिन जीवन।...

श्री श्याम जाजू जी को इस उत्कृष्ट एवं प्रेरणादायक कृति RSS@100"के लिए हार्दिक बधाई,

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मेरी कलम से… — अधिवक्ता संदीप दुबे आज भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ संगठनकर्ता श्री श्याम जाजू जी से भेंट का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस अवसर पर उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने पर अपने द्वारा लिखित पुस्तक "RSS@100" स्नेहपूर्वक भेंट की। इस पुस्तक को पढ़ते हुए संघ की शताब्दी यात्रा, उसके विचार, सेवा, संगठन और राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण का व्यापक एवं प्रेरणादायक चित्र सामने आता है। श्री श्याम जाजू जी स्वयं दशकों तक भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठनात्मक कार्यों से जुड़े रहे हैं। राष्ट्रहित, संगठन और कार्यकर्ता निर्माण के प्रति उनका समर्पण अनुकरणीय है। उनकी लेखनी में अनुभव की गहराई, तथ्य की प्रामाणिकता और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यह पुस्तक केवल संघ के 100 वर्षों का इतिहास नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और राष्ट्र निर्माण की प्रेरक यात्रा का दस्तावेज़ है। मैं आदरणीय श्री श्याम जाजू जी को इस उत्कृष्ट एवं प्रेरणादायक कृति के लिए हार्दिक बधाई, साधुवाद एवं शुभकामनाएँ देता ...

ग्लोबल छठ : मानवता, प्रकृति और सत्य का वैश्विक अभियान

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ग्लोबल छठ : मानवता, प्रकृति और सत्य का वैश्विक अभियान "छठ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि मानवता को जोड़ने वाली जीवनशैली है।" भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में छठ महापर्व का एक विशिष्ट स्थान है। यह ऐसा लोकपर्व है जो किसी एक जाति, वर्ग, भाषा या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानव समाज को सत्य, अनुशासन, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामाजिक समरसता का संदेश देता है। आज जब विश्व जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय संकट, सामाजिक विघटन और मानवीय मूल्यों के ह्रास जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब छठ महापर्व का दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाता है। इसी विचार को वैश्विक मंच प्रदान करने के उद्देश्य से "ग्लोबल छठ" की अवधारणा सामने आई है। इसका उद्देश्य केवल छठ महापर्व का प्रचार-प्रसार करना नहीं, बल्कि इसके माध्यम से विश्व समुदाय को "प्रकृति के साथ संतुलित जीवन, सत्य के मार्ग और मानवता की एकता" का संदेश देना है। छठ महापर्व हमें सिखाता है कि सूर्य केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन, समानता और आशा का प्रतीक है। नदी केवल जल का प्रवाह नहीं, बल्कि सभ्यता की...

प्रकृति के नियमों को चुनौती देता इंसान: क्या विनाश निकट है?

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प्रकृति के नियमों को चुनौती देता इंसान: क्या उसका अंत निकट है? "जब मनुष्य स्वयं को प्रकृति से बड़ा समझने लगता है, तभी उसके पतन की शुरुआत हो जाती है।" मानव सभ्यता ने विज्ञान, तकनीक और विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। उसने आकाश को छू लिया, समुद्र की गहराइयों को माप लिया और अंतरिक्ष तक अपनी पहुँच बना ली। लेकिन इसी विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य प्रकृति के उन सनातन नियमों को चुनौती देने लगा है, जिन पर स्वयं उसका अस्तित्व आधारित है। धरती का बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों का पिघलना, नदियों का प्रदूषण, जंगलों का विनाश, जैव विविधता का समाप्त होना, महामारी, सूखा, बाढ़ और विनाशकारी प्राकृतिक आपदाएँ—ये केवल संयोग नहीं हैं। ये प्रकृति के असंतुलन की स्पष्ट चेतावनियाँ हैं। प्रकृति किसी से प्रतिशोध नहीं लेती, बल्कि अपना संतुलन पुनः स्थापित करती है। दुर्भाग्य से इस प्रक्रिया में सबसे अधिक प्रभावित स्वयं मनुष्य होता है। आज मनुष्य विकास के नाम पर प्रकृति का दोहन कर रहा है। विज्ञान का उद्देश्य मानव कल्याण होना चाहिए, लेकिन यदि वही विज्ञान अहंकार, लालच और असीम उपभोग...