मंथन से मार्गदर्शन तक -मेरे गुरु

मेरे गुरु — श्री सतीश उपाध्याय

मंथन से मार्गदर्शन तक

एक शिष्य की दृष्टि से व्यक्तित्व, विचार और प्रेरणा की यात्रा

परम आदरणीय श्री सतीश उपाध्याय जी को

यह पुस्तक उस व्यक्ति को समर्पित है, जिन्हें मैंने केवल सार्वजनिक जीवन के एक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि अपने गुरु, मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत के रूप में अनुभव किया है।

जीवन में कुछ लोग हमें उत्तर नहीं देते, बल्कि हमें उत्तर खोजने की दिशा देते हैं।
कुछ लोग हमारे लिए रास्ता नहीं बनाते, बल्कि हमें स्वयं रास्ता बनाने का साहस देते हैं।

मेरे जीवन में श्री सतीश उपाध्याय जी की भूमिका ऐसी ही रही है।

जब मेरे मन में Chhathi Maiya Foundation की स्थापना का विचार पहली बार आकार ले रहा था, तब इस विचार को लेकर मैं सबसे पहले उन्हीं के पास गया। मैंने अपने मन की बात उनके सामने रखी।

मैं चाहता था कि छठ महापर्व की आस्था, संस्कृति, सामाजिक एकता, प्रकृति के प्रति सम्मान और बिहार-पूर्वांचल की सांस्कृतिक चेतना को एक व्यापक मंच मिले।

उन्होंने मेरी बात सुनी।

उन्होंने मुझे कोई तैयार योजना नहीं थमाई। उन्होंने उससे कहीं अधिक मूल्यवान चीज दी—“मंथन का मंत्र।”

उन्होंने कहा कि बिहार के लोगों से मिलो। समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच जाओ। लोगों की बात सुनो। संवाद करो। विचारों को समझो और उसके बाद तय करो कि इस सांस्कृतिक संकल्प को किस दिशा में आगे बढ़ाना है।

उनकी इस सीख ने मेरे सोचने का तरीका बदल दिया।

मैंने अनुभव किया कि कोई भी बड़ा सामाजिक कार्य केवल एक व्यक्ति के मन में उत्पन्न विचार से बड़ा नहीं बनता। वह तब बड़ा बनता है जब उस विचार में समाज की आवाज, अनुभव और सहभागिता जुड़ती है।

यही मेरे लिए मंथन का मंत्र था।

आगे चलकर Chhathi Maiya Foundation की यात्रा में अनेक लोग जुड़े, अनेक विचार सामने आए और छठ की सांस्कृतिक चेतना को व्यापक स्तर पर ले जाने का संकल्प मजबूत होता गया। लेकिन मेरे मन में आज भी वह पहला संवाद जीवित है।

क्योंकि विचार मेरा था,
लेकिन उस विचार को समाज के बीच ले जाकर मंथन करने की दिशा मेरे गुरु ने दिखाई।

इसीलिए यह पुस्तक उनके सार्वजनिक जीवन का केवल घटनाक्रम नहीं है। यह उस मार्गदर्शन की भी कथा है, जिसे मैंने स्वयं अनुभव किया है।

गुरु वह नहीं जो शिष्य को अपने पीछे चलना सिखाए;
गुरु वह है जो शिष्य को समाज के बीच जाकर अपना मार्ग खोजने की दृष्टि दे।

इस पुस्तक को मैं श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ अपने गुरु
श्री सतीश उपाध्याय जी
के चरणों में समर्पित करता हूँ।

— Sandeep Kumar Dubey

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लेखक की बात

वह पहली बातचीत जिसने दिशा बदल दी

हर संस्था बनने से पहले एक विचार होती है।

और हर विचार के पीछे कोई न कोई क्षण ऐसा होता है, जब मन के भीतर चल रही बात पहली बार शब्दों में बाहर आती है।

मेरे लिए Chhathi Maiya Foundation की यात्रा का ऐसा क्षण श्री सतीश उपाध्याय जी के साथ जुड़ा हुआ है।

छठ मेरे लिए केवल एक पर्व नहीं था। बचपन से परिवार और समाज में इसकी आस्था, अनुशासन और लोक-संस्कृति को मैंने निकट से देखा था। समय के साथ मेरे भीतर यह प्रश्न उठने लगा कि इतनी विशाल सांस्कृतिक परंपरा को सामाजिक और संस्थागत स्तर पर और प्रभावी ढंग से सामने क्यों न लाया जाए?

विचार था, लेकिन प्रश्न भी बहुत थे।

कहाँ से शुरुआत की जाए?

किसे जोड़ा जाए?

क्या यह केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित रहेगा या इसे संस्कृति, पर्यावरण, समाज और आने वाली पीढ़ियों से भी जोड़ा जा सकता है?

इन्हीं प्रश्नों के बीच मैंने अपने मन में जन्मे Chhathi Maiya Foundation के विचार को सबसे पहले अपने गुरु श्री सतीश उपाध्याय जी के सामने रखा।

उन्होंने धैर्यपूर्वक मेरी बात सुनी।

उस बातचीत से मुझे जो संदेश मिला, उसे मैं आज “मंथन का मंत्र” कहता हूँ।

उन्होंने मुझे बिहार के लोगों से मिलने की सलाह दी। उनका संदेश स्पष्ट था—पहले समाज को सुनो। लोगों से संवाद करो। अलग-अलग विचारों को समझो। किसी सामाजिक-सांस्कृतिक अभियान को व्यापक स्वरूप देना है तो उसकी नींव सहभागिता पर रखो।

यह बात सरल दिखाई देती है, परंतु मेरे लिए इसमें एक गहरा दर्शन था।

विचार से पहले संवाद।
निर्णय से पहले मंथन।
और नेतृत्व से पहले समाज को सुनना।

इसके बाद मेरी दृष्टि में परिवर्तन आया।

मैंने समझा कि Chhathi Maiya Foundation केवल मेरी कल्पना की संस्था नहीं हो सकती। इसे उन करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ना होगा जिनके जीवन में छठ आस्था, परिवार, प्रकृति और सामाजिक समरसता का प्रतीक है।

आज जब मैं पीछे मुड़कर इस यात्रा को देखता हूँ, तो उस शुरुआती संवाद का महत्व और अधिक समझ आता है।

इसी अनुभव से इस पुस्तक का जन्म हुआ है।

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पुस्तक की प्रस्तावित संरचना — लगभग 200 पृष्ठ

भाग एक — व्यक्ति से परिचय

1. श्री सतीश उपाध्याय : एक परिचय
2. परिवार, संस्कार और प्रारंभिक जीवन
3. शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण
4. समाज के प्रति झुकाव
5. सार्वजनिक जीवन की ओर यात्रा

भाग दो — संगठन और सार्वजनिक जीवन
6. संगठन से जुड़ाव
7. कार्यकर्ता और नेतृत्व
8. दिल्ली में सार्वजनिक जीवन
9. संगठनात्मक जिम्मेदारियों का अनुभव
10. जनसंवाद की शैली
11. स्थानीय समस्याओं से जुड़ाव
12. सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ
13. सार्वजनिक जीवन में अनुशासन
14. राजनीतिक यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव
15. मालवीय नगर और जनप्रतिनिधित्व

भाग तीन — मेरे गुरु सतीश उपाध्याय
16. मेरी उनसे पहली निकटता
17. मैंने उन्हें गुरु क्यों माना
18. गुरु और मार्गदर्शक में अंतर
19. कठिन समय में मिली सीख
20. लोगों से मिलने का उनका तरीका
21. सुनने की कला
22. कार्यकर्ता को आगे बढ़ाने की सोच

भाग चार — Chhathi Maiya Foundation की कहानी
23. मेरे मन में जन्मा एक विचार
24. सबसे पहले गुरु से कही मन की बात
25. वह महत्वपूर्ण मुलाकात
26. “बिहार के लोगों से मिलिए”
27. मंथन का मंत्र
28. समाज को सुनने की यात्रा
29. विचार से संस्था तक
30. Chhathi Maiya Foundation की स्थापना
31. संस्कृति को संगठन से जोड़ने की कोशिश
32. छठ, समाज और पर्यावरण
33. स्थानीय आस्था से वैश्विक सांस्कृतिक संवाद तक

भाग पाँच — मंथन का दर्शन
34. मंथन आखिर है क्या?
35. बोलने से पहले सुनना
36. निर्णय से पहले संवाद
37. असहमति का सम्मान
38. समाज से सीखने वाला नेतृत्व
39. संगठन व्यक्ति से बड़ा क्यों है
40. जड़ों से जुड़े रहने का संदेश

भाग छह — गुरु से मिली जीवन-दृष्टि
41. धैर्य
42. विनम्रता
43. संबंधों की शक्ति
44. सार्वजनिक जीवन में व्यवहार
45. संकट में संयम
46. कार्यकर्ता का सम्मान
47. समाज को साथ लेकर चलना
48. संस्कृति और राष्ट्रबोध
49. अगली पीढ़ी के लिए संदेश

भाग सात — स्मृतियाँ और संवाद
50. मेरे संस्मरण
51. गुरु के साथ संवाद के क्षण
52. वे बातें जो आज भी याद हैं
53. Chhathi Maiya Foundation के महत्वपूर्ण पड़ाव
54. गुरु से मिली सीख और मेरी यात्रा
55. एक शिष्य की कृतज्ञता

उपसंहार

“एक विचार मैंने रखा था, मंथन की दिशा गुरु ने दी।”

Chhathi Maiya Foundation के निर्माण की कहानी मेरे लिए केवल किसी संस्था की स्थापना की कहानी नहीं है।

यह विश्वास की कहानी है।

यह संवाद की कहानी है।

और सबसे बढ़कर, यह उस गुरु-मंत्र की कहानी है जिसने मुझे सिखाया कि समाज के लिए कुछ करना हो तो सबसे पहले समाज के बीच जाना चाहिए।

मेरे गुरु श्री सतीश उपाध्याय जी ने मुझे मंथन का मंत्र दिया।

वह मंत्र आज भी मेरी यात्रा में मेरे साथ है।

मेरे — श्री सतीश उपाध्याय

मंथन से मार्गदर्शन तक

एक शिष्य की दृष्टि से व्यक्तित्व, विचार और प्रेरणा की यात्रा

लेखक
Sandeep Kumar Dubey
Advocate, Supreme Court of India
Mediator
Chairman – Chhathi Maiya Foundation


अध्याय 1

मेरे — श्री सतीश उपाध्याय

जीवन की लंबी यात्रा में हमारी मुलाकात असंख्य लोगों से होती है। कुछ लोग हमारे साथ थोड़ी दूर चलते हैं, कुछ स्मृतियों में रह जाते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो हमारे सोचने की दिशा को ही बदल देते हैं।

मेरे जीवन में श्री सतीश उपाध्याय जी का स्थान इसी तीसरी श्रेणी में है।

मैं उन्हें केवल सार्वजनिक जीवन से जुड़े एक व्यक्ति के रूप में नहीं देखता। मेरे लिए उनका परिचय इससे कहीं अधिक व्यक्तिगत और आत्मीय है।

वे मेरे गुरु हैं।

गुरु शब्द मेरे लिए केवल सम्मानसूचक संबोधन नहीं है। भारतीय परंपरा में गुरु वह है जो व्यक्ति को केवल यह नहीं बताता कि उसे कहाँ पहुँचना है, बल्कि उसके भीतर ऐसी दृष्टि विकसित करता है कि वह अपना रास्ता स्वयं पहचान सके।

मेरे जीवन में श्री सतीश उपाध्याय जी से मिली एक सीख ऐसी ही रही—मंथन की सीख।


एक विचार जो मन में जन्मा

मेरे जीवन में छठ महापर्व का संबंध केवल किसी धार्मिक आयोजन से नहीं रहा। यह मेरी स्मृतियों, मेरे परिवार, मेरे गांव, बिहार की मिट्टी और मेरी सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा विषय रहा है।

बचपन में मैंने अपने परिवार में छठ की आस्था को देखा और अनुभव किया। मेरी दादी रामपरी देवी के छठ गीतों की स्मृतियाँ आज भी मेरे मन में जीवित हैं। मेरी मां ने भी छठ व्रत और उसकी परंपराओं के माध्यम से मुझे इस संस्कृति से जोड़ा।

समय बीतता गया।

मैं बिहार से बाहर निकला। शिक्षा, कानून और सार्वजनिक जीवन के अनुभवों ने मेरे सामने समाज का एक व्यापक स्वरूप रखा। लेकिन जितना मैं आगे बढ़ा, उतनी ही अपनी जड़ों की अनुभूति भी गहरी होती गई।

एक समय मेरे मन में प्रश्न उठा—

छठ जैसी महान लोक-परंपरा के लिए ऐसा संस्थागत प्रयास क्यों न हो जो इसकी संस्कृति, सामाजिक संदेश, पर्यावरणीय चेतना और लोक परंपराओं को व्यापक स्तर पर सामने लाए?

यह प्रश्न धीरे-धीरे विचार में बदलने लगा।

और उसी विचार से भविष्य के Chhathi Maiya Foundation का बीज मेरे मन में अंकुरित हुआ।

लेकिन किसी विचार का मन में आ जाना और उसे समाज के बीच वास्तविक स्वरूप देना दो अलग-अलग बातें हैं।

मेरे सामने भी यही चुनौती थी।

मैं सोच रहा था—इस विचार की शुरुआत कहाँ से हो?

किससे बात करूं?

किन लोगों को साथ लेकर चलूं?

और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—

क्या मेरे मन का यह विचार वास्तव में समाज की आवश्यकता और भावना से जुड़ता है?

ऐसे समय में मन स्वाभाविक रूप से उस व्यक्ति की ओर जाता है जिस पर आपको भरोसा हो।

मेरे लिए वह व्यक्ति थे—

मेरे गुरु, श्री सतीश उपाध्याय जी।


सबसे पहले  कही मन की बात

Chhathi Maiya Foundation का विचार जब मेरे मन में आया, तो मैंने सबसे पहले श्री सतीश उपाध्याय जी से अपने मन की बात कही।                           आज भी उस प्रसंग को याद करता हूं तो मुझे लगता है कि वह केवल एक बातचीत नहीं थी।

वह मेरी आगे की यात्रा के लिए दिशा निर्धारित करने वाला क्षण था।

मैंने उनके सामने अपनी भावना रखी।

मैंने बताया कि छठ के लिए एक ऐसा मंच बनाने की मेरी इच्छा है जो केवल पर्व के आयोजन तक सीमित न हो। वह समाज को जोड़े, अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति नई पीढ़ी में चेतना पैदा करे और छठ के भीतर निहित प्रकृति तथा सामाजिक समरसता के संदेश को भी आगे बढ़ाए।

मैंने अपने मन की बात रख दी।

अब मैं उनकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहा था।

कई बार जब हम अपने किसी प्रिय विचार को किसी वरिष्ठ व्यक्ति के सामने रखते हैं तो हमारे मन में अपेक्षा होती है कि वह तुरंत उसकी प्रशंसा करे और कहे—बहुत अच्छा विचार है, आगे बढ़िए।

लेकिन एक वास्तविक गुरु की भूमिका इससे अलग होती है।

वह केवल उत्साह नहीं देता।

वह दृष्टि देता है।

श्री सतीश उपाध्याय जी ने मेरी बात सुनी और मुझे एक ऐसी सलाह दी जिसने मेरे सोचने के तरीके को प्रभावित किया।

उन्होंने मुझसे कहा कि—

बिहार के लोगों से मिलिए।

लोगों के बीच जाइए।

उनसे बात कीजिए।

उनके विचार जानिए।

समाज को सुनिए।

और फिर मंथन कीजिए।

आज मैं उस सीख को एक नाम देता हूं—

“मंथन का मंत्र”


मंथन का मंत्र

यह शब्द सुनने में छोटा है, लेकिन मेरे लिए इसके मायने बहुत बड़े हैं।

उन्होंने मुझे यह नहीं कहा कि आप अपने विचार को छोड़ दीजिए।

उन्होंने यह भी नहीं कहा कि जो आपके मन में है वही अंतिम सत्य है।

उन्होंने मुझे तीसरा रास्ता दिखाया—

अपने विचार को समाज के बीच लेकर जाओ।

मैंने इस बात पर विचार किया।

तब मुझे महसूस हुआ कि किसी सामाजिक संस्था का निर्माण केवल उसके संस्थापक के विचार से नहीं होना चाहिए।

अगर वह समाज की संस्था बनना चाहती है, तो उसमें समाज की आवाज भी होनी चाहिए।

और यह आवाज कैसे आएगी?

संवाद से।

लोगों से मिलने से।

उन्हें सुनने से।

अलग-अलग विचारों को समझने से।

यही मंथन है।


पहले सुनो, फिर आगे बढ़ो

हमारे सार्वजनिक जीवन की एक बड़ी चुनौती यह है कि हर व्यक्ति अपनी बात कहना चाहता है, लेकिन दूसरे की बात सुनने का धैर्य धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।

लेकिन गुरु ने मुझे उल्टा रास्ता बताया।

पहले सुनो।

यह सीख मेरे लिए केवल Chhathi Maiya Foundation तक सीमित नहीं रही।

कानून के क्षेत्र में भी मैं वर्षों से देखता आया हूं कि अनेक विवाद इसलिए बढ़ते हैं क्योंकि दोनों पक्ष अपनी बात कहना चाहते हैं, लेकिन सामने वाले को सुनना नहीं चाहते।

एक Mediator के रूप में भी मैंने अनुभव किया है कि संवाद तभी संभव होता है जब सुनने की इच्छा हो।

यही बात सामाजिक नेतृत्व पर भी लागू होती है।

यदि आप समाज को बदलना चाहते हैं, तो पहले समाज को समझना होगा।

और समाज को समझने का सबसे सरल रास्ता है—

उसके बीच जाना।


बिहार के लोगों से मिलो

“बिहार के लोगों से मिलो”—यह मेरे लिए केवल भौगोलिक निर्देश नहीं था।

इसका अर्थ बहुत व्यापक था।

बिहार कोई केवल नक्शे पर बनी सीमा नहीं है।

बिहार अपने भीतर हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान, लोकगीत, लोकपरंपराएं और जीवन-दर्शन समेटे हुए है।

और छठ तो इस सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के सबसे जीवंत स्वरूपों में से एक है।

छठ किसी एक परिवार का पर्व नहीं।

किसी एक जाति का पर्व नहीं।

किसी एक आर्थिक वर्ग का पर्व नहीं।

घाट पर जब सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है तो समाज की अनेक दीवारें स्वतः छोटी दिखाई देने लगती हैं।

वहां अमीर और गरीब दोनों एक ही जल में खड़े होते हैं।

परिवार एक साथ होता है।

प्रकृति पूजा का केंद्र बनती है।

डूबते सूर्य और उगते सूर्य—दोनों को समान श्रद्धा से अर्घ्य दिया जाता है।

इसलिए यदि छठ को लेकर कोई संस्था बनानी थी, तो उसे लोगों की भावनाओं को समझना आवश्यक था।

गुरु का संदेश बिल्कुल सही दिशा में था—

समाज के पास जाओ।


गुरु उत्तर नहीं देता, प्रश्न करना सिखाता है

समय के साथ मैंने गुरु के अर्थ को और गहराई से समझा।

एक अच्छा मार्गदर्शक आपके प्रत्येक प्रश्न का तैयार उत्तर नहीं देता।

कई बार वह आपके सामने एक नया प्रश्न खड़ा कर देता है।

वह कहता है—

जाइए।

देखिए।

समझिए।

लोगों से मिलिए।

फिर स्वयं निर्णय कीजिए।

ऐसी सीख व्यक्ति को निर्भर नहीं बनाती।

वह उसे सक्षम बनाती है।

श्री सतीश उपाध्याय जी की उस सलाह में मुझे यही भाव दिखाई दिया।

उन्होंने मुझे अपनी छाया में खड़े रहने का संदेश नहीं दिया।

उन्होंने मुझे समाज के बीच जाने का संदेश दिया।

मेरे लिए गुरु की यही सबसे बड़ी पहचान है।


विचार मेरा था, दिशा गुरु की थी

मैं इस प्रसंग को लिखते समय एक बात बहुत स्पष्ट रखना चाहता हूं।

Chhathi Maiya Foundation का विचार मेरे मन में जन्मा था।

लेकिन उस विचार को लेकर किस प्रकार समाज के बीच जाना चाहिए, इस दिशा में मेरे गुरु श्री सतीश उपाध्याय जी की सलाह मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

इसीलिए मैं इसे हमेशा इस तरह याद करता हूं—

“विचार मेरे मन में आया था, लेकिन मंथन की दिशा गुरु ने दिखाई।”

इस एक वाक्य में मेरे और उनके संबंध की बहुत-सी बातें समाहित हैं।


संस्था से बड़ा उद्देश्य

धीरे-धीरे मेरे मन में यह स्पष्ट होने लगा कि उद्देश्य केवल एक संस्था खड़ी करना नहीं होना चाहिए।

संस्था तो माध्यम है।

मूल उद्देश्य उससे कहीं बड़ा होना चाहिए।

छठ की परंपरा को समझना।

उसकी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना।

नई पीढ़ी को उससे जोड़ना।

पर्यावरण और नदियों के प्रति जिम्मेदारी की भावना को आगे बढ़ाना।

देश और दुनिया में बसे छठ से जुड़े समुदायों को एक दूसरे से जोड़ना।

और सबसे महत्वपूर्ण—

आस्था को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ना।

मेरे भीतर यह दृष्टि एक दिन में विकसित नहीं हुई।

यह निरंतर मंथन की प्रक्रिया थी।


मेरे गुरु का मेरे जीवन में स्थान

आज जब मैं श्री सतीश उपाध्याय जी के विषय में पुस्तक लिखने बैठा हूं, तो मेरे सामने सबसे कठिन प्रश्न यही है कि उनके साथ अपने संबंध को शब्दों में कैसे व्यक्त करूं।

राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन के पदों का उल्लेख किया जा सकता है।

तारीखें लिखी जा सकती हैं।

जिम्मेदारियां लिखी जा सकती हैं।

सार्वजनिक उपलब्धियों का दस्तावेज तैयार किया जा सकता है।

लेकिन किसी व्यक्ति का आपके जीवन पर जो व्यक्तिगत प्रभाव होता है, उसका कोई सरकारी रिकॉर्ड नहीं होता।

वह आपके भीतर दर्ज होता है।

मेरे भीतर भी एक स्मृति दर्ज है—

जब मेरे मन में Chhathi Maiya Foundation का विचार आया, तो जिस व्यक्ति से मैंने सबसे पहले अपने मन की बात कही, वह मेरे गुरु श्री सतीश उपाध्याय जी थे।

और उन्होंने मुझे दिया—

मंथन का मंत्र।


मेरी यात्रा का पहला सूत्र

उस दिन की सीख को यदि मुझे तीन पंक्तियों में लिखना हो तो मैं लिखूंगा—

विचार हो तो समाज के बीच ले जाओ।
निर्णय लेना हो तो पहले संवाद करो।
नेतृत्व करना हो तो पहले सुनना सीखो।

मेरे लिए यही मंथन का मंत्र है।

और शायद यही वह सूत्र है जिसके कारण गुरु और शिष्य का रिश्ता केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं रहता।

वह एक विचार-परंपरा बन जाता है।


अध्याय का अंतिम विचार

आज Chhathi Maiya Foundation की यात्रा को देखते हुए मैं उस प्रारंभिक क्षण को भूल नहीं सकता।

हर बड़ी यात्रा के पीछे कोई छोटा-सा क्षण होता है।

कभी वह एक मुलाकात होती है।

कभी एक वाक्य।

कभी किसी वरिष्ठ का हाथ।

और कभी केवल एक सलाह।

मेरी इस यात्रा में वह सलाह थी—

“लोगों से मिलिए, उनकी बात सुनिए और मंथन कीजिए।”

इसीलिए इस पुस्तक की यात्रा भी वहीं से प्रारंभ होती है।

मेरे गुरु से।

मेरे मन की पहली बात से।

और—

“मंथन के उस मंत्र से, जिसने एक विचार को समाज की ओर चलना सिखाया।”

अध्याय 2

संस्कारों से निर्मित व्यक्तित्व


श्री सतीश उपाध्याय जी की जीवन-यात्रा को समझने का प्रयास

किसी व्यक्ति के सार्वजनिक जीवन को समझने के लिए केवल उसके पदों की सूची पर्याप्त नहीं होती।

पद हमें यह बताते हैं कि व्यक्ति कहां तक पहुंचा, लेकिन उसके संस्कार हमें यह समझने में सहायता करते हैं कि वह वहां तक पहुंचा कैसे।

मेरे गुरु श्री सतीश उपाध्याय जी को समझने के लिए भी मेरी दृष्टि में यही अंतर महत्वपूर्ण है।

मैंने उन्हें जब भी निकट से देखा, मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं रही कि उनके पास कौन-सा पद है। मेरे लिए अधिक महत्वपूर्ण रहा उनका लोगों के साथ व्यवहार, संवाद करने का तरीका और किसी विषय पर निर्णय लेने से पहले उसे समझने की प्रवृत्ति।

यही कारण है कि इस पुस्तक में मैं उनके जीवन को केवल राजनीतिक घटनाओं की श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहता।

यह पुस्तक उस व्यक्ति को समझने का प्रयास है जिसने मुझे स्वयं एक बहुत साधारण लेकिन गहरा सूत्र दिया—

लोगों से मिलो।

लोगों को सुनो।

और मंथन करो।


शिक्षा से व्यक्तित्व निर्माण तक

उपलब्ध चुनावी अभिलेख के अनुसार श्री सतीश उपाध्याय जी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के Atma Ram Sanatan Dharma College (A.R.S.D. College) से बी.ए. की शिक्षा पूरी की। उनके चुनावी शपथपत्र में इसे वर्ष 1984 में पूर्ण किया गया बताया गया है।

शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं होती।

युवावस्था और विश्वविद्यालय का समय वह दौर होता है जब व्यक्ति समाज को अपने परिवार की सीमाओं से बाहर जाकर देखना शुरू करता है।

अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए लोगों से मिलना, विचारों को सुनना, मतभेदों को देखना और समाज की विविधता को समझना—ये सभी अनुभव व्यक्तित्व निर्माण में भूमिका निभाते हैं।

मेरी दृष्टि में सार्वजनिक जीवन के लिए सबसे आवश्यक गुणों में से एक है—

 समझने की इच्छा।

और यही गुण मैंने बाद के वर्षों में अपने गुरु के व्यवहार में अनुभव किया।

व्यक्ति से पहले व्यवहार

किसी बड़े व्यक्ति की पहचान केवल इस बात से नहीं होनी चाहिए कि कितने लोग उसे जानते हैं।

एक और कसौटी भी हो सकती है—

वह स्वयं कितने लोगों को सुनता है?

मेरे अनुभव में श्री सतीश उपाध्याय जी के व्यक्तित्व की एक महत्वपूर्ण विशेषता संवाद रही है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण मेरे अपने जीवन में मौजूद है।

जब मैं Chhathi Maiya Foundation का विचार लेकर उनके पास गया था, तब वे चाहते तो केवल इतना कह सकते थे—

“बहुत अच्छा विचार है, आगे बढ़िए।”

मेरे लिए भी शायद इतना सुनना पर्याप्त होता।

लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उन्होंने उस विचार को एक अगली प्रक्रिया से जोड़ा।

उन्होंने कहा—

बिहार के लोगों से मिलिए।

इस एक सलाह में मुझे उनके व्यक्तित्व की एक महत्वपूर्ण झलक दिखाई देती है।

उनके लिए किसी व्यक्ति के मन में आया विचार ही अंतिम बिंदु नहीं था।

उस विचार का समाज के साथ संवाद भी आवश्यक था।


समाज को सुनने की कला

आज सूचना का युग है।

हर व्यक्ति के पास अपनी बात कहने के अनेक माध्यम हैं।

लेकिन शायद इसी दौर में सुनने की कला अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

सुनने का अर्थ है—

उसके अनुभव को समझना।

उसकी परिस्थिति को जानना।

उसके विचार से सहमत होना आवश्यक नहीं, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि वह ऐसा क्यों सोचता है।

मुझे गुरु से मिले “मंथन के मंत्र” में यही दर्शन दिखाई देता है।

यदि उन्होंने मुझसे कहा कि बिहार के लोगों से मिलो, तो उसका अर्थ मेरे लिए यह था कि Chhathi Maiya Foundation का स्वरूप तय करने से पहले उस समाज की धड़कन को समझो जिसके सांस्कृतिक जीवन में छठ इतनी गहराई से बसा है।

यह बात मेरे भीतर उतरती चली गई।


सार्वजनिक जीवन की ओर यात्रा

 श्री सतीश उपाध्याय जी की लंबी सार्वजनिक यात्रा के अलग-अलग पड़ावों को दर्ज करते हैं।

वर्ष 2012 के नगर निगम चुनाव संबंधी चुनावी रिकॉर्ड में वे मालवीय नगर वार्ड से विजेता दर्ज हैं। 

वर्षों बाद उनकी यात्रा दिल्ली विधानसभा तक पहुंची।

2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में वे भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में मालवीय नगर निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित हुए।

आज दिल्ली विधानसभा के आधिकारिक अभिलेख में वे मालवीय नगर विधानसभा क्षेत्र के विधायक के रूप में दर्ज हैं।

लेकिन किसी व्यक्ति की लंबी सार्वजनिक यात्रा को केवल इन दो बिंदुओं से नहीं समझा जा सकता।

नगरपालिका स्तर का सार्वजनिक जीवन और विधानसभा का जनप्रतिनिधित्व—दोनों के बीच वर्षों का अनुभव, संगठन, लोगों से संपर्क और बदलती सामाजिक परिस्थितियों को समझने की प्रक्रिया होती है।

यही वह यात्रा है जिसे इस पुस्तक के आगामी अध्यायों में विस्तार से समझने का प्रयास किया जाएगा।

जमीन से जुड़ाव का महत्व

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि और जनता के बीच संबंध केवल चुनाव के समय नहीं बनता।

वास्तविक संबंध रोजमर्रा की समस्याओं के बीच बनता है।

किसी सड़क की समस्या हो सकती है।

किसी पार्क की।

पानी की।

स्वच्छता की।

किसी परिवार की व्यक्तिगत परेशानी की।

किसी सामाजिक संस्था की आवश्यकता की।

या किसी सांस्कृतिक आयोजन की।

स्थानीय सार्वजनिक जीवन व्यक्ति को ऐसी समस्याओं से सीधे परिचित कराता है।

मेरे लिए यह समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि जब गुरु ने मुझे लोगों से मिलने का संदेश दिया, तो वह सलाह केवल सैद्धांतिक नहीं थी।

उसके पीछे समाज के बीच काम करने का अनुभव दिखाई देता था।

“पहले लोगों के बीच जाओ”

कई वर्षों बाद भी मेरे मन में यह प्रश्न आता है—

उन्होंने मुझे सीधे Foundation बनाने के लिए क्यों नहीं कहा?

क्यों कहा कि पहले लोगों से मिलो?

शायद उत्तर उसी सामाजिक दर्शन में छिपा है जिसे मैं इस पुस्तक में “मंथन” कह रहा हूं।

यदि किसी संस्था को लंबे समय तक चलना है तो केवल संस्थापक की इच्छा पर्याप्त नहीं है।

उसे लोगों का विश्वास चाहिए।

लोगों की सहभागिता चाहिए।

लोगों की भावनाओं को समझना चाहिए।

और सबसे महत्वपूर्ण—

उस संस्था के उद्देश्य में समाज को अपना प्रतिबिंब दिखाई देना चाहिए।

इसलिए मेरे लिए गुरु का संदेश था—

Foundation बनाने से पहले उसकी सामाजिक आत्मा खोजो।

गुरु की एक सीख और मेरा पेशा

मैं पेशे से अधिवक्ता हूं।

सर्वोच्च न्यायालय में कानून की दुनिया से जुड़े रहने और एक Mediator के रूप में काम करने के कारण संवाद का महत्व मेरे पेशेवर जीवन में भी बहुत गहरा है।

अदालत में विवाद का अपना स्वरूप होता है।

दो पक्ष होते हैं।

दोनों के अपने तथ्य होते हैं।

दोनों की अपनी व्याख्या होती है।

लेकिन Mediation में एक और तत्व सामने आता है—

सुनना।

कई बार समाधान कानून की किसी धारा से पहले संवाद के द्वार से निकलता है।

जब दोनों पक्ष एक-दूसरे को सुनना शुरू करते हैं, तब वर्षों से चला आ रहा विवाद भी नए रूप में दिखाई देने लगता है।

इसलिए जब गुरु ने मुझे “लोगों से मिलो” और मंथन करने की दिशा दिखाई, तो मैं उससे व्यक्तिगत रूप से भी जुड़ सका।

मुझे लगा कि समाज और mediation में एक गहरी समानता है।

दोनों में अपनी बात रखने से पहले दूसरे को सुनना आवश्यक है।

नेतृत्व का अर्थ

नेतृत्व को अक्सर मंच, भाषण और पद से जोड़कर देखा जाता है।

लेकिन नेतृत्व का एक शांत स्वरूप भी है।

किसी युवा को सही दिशा देना।

किसी कार्यकर्ता को सुनना।

किसी व्यक्ति के विचार को तुरंत स्वीकार या अस्वीकार करने के बजाय उसे समाज के बीच जाकर परखने के लिए प्रेरित करना।

ऐसे छोटे-छोटे क्षण सार्वजनिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होते।

उनकी कोई प्रेस विज्ञप्ति नहीं होती।

कोई सरकारी दस्तावेज नहीं होता।

लेकिन जिस व्यक्ति को वह सलाह मिली होती है, उसके जीवन में उनका महत्व बहुत बड़ा हो सकता है।

मेरे लिए ऐसा ही एक क्षण Chhathi Maiya Foundation के विचार के समय आया।

पद आते-जाते हैं, संबंध रह जाते हैं

सार्वजनिक जीवन में पद स्थायी नहीं होते।

आज कोई व्यक्ति किसी जिम्मेदारी पर है, कल किसी दूसरी जिम्मेदारी पर होगा।

लेकिन किसी व्यक्ति ने अपने आसपास के लोगों के जीवन में क्या छोड़ा—यह अधिक स्थायी हो सकता है।

किसी ने अवसर दिया।

किसी ने साहस दिया।

किसी ने संकट में साथ दिया।

और किसी ने एक ऐसा विचार दे दिया जिसने सोचने का तरीका बदल दिया।

मेरे लिए श्री सतीश उपाध्याय जी से मिला ऐसा विचार था—

मंथन।

मैंने इसे केवल एक सलाह नहीं माना।

धीरे-धीरे यह मेरे सामाजिक जीवन की कार्यपद्धति का हिस्सा बनने लगा।

गुरु और शिष्य

भारतीय संस्कृति में गुरु और शिष्य का संबंध अत्यंत प्राचीन है।

लेकिन गुरु का अर्थ केवल आध्यात्मिक या शैक्षणिक शिक्षक तक सीमित नहीं है।

जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में हमें ऐसे व्यक्ति मिल सकते हैं जिनसे हमें दिशा मिलती है।

मेरी दृष्टि में गुरु की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि वह शिष्य को अपनी प्रतिकृति बनाने का प्रयास नहीं करता।

वह उसके भीतर की क्षमता को पहचानने और विकसित होने का अवसर देता है।

गुरु कहता है—

मैंने जो देखा है, उससे सीखो; लेकिन अपना रास्ता स्वयं खोजो।

यही कारण है कि मैंने इस पुस्तक का नाम केवल किसी राजनीतिक जीवन-वृत्तांत के आधार पर नहीं रखा।

मेरे लिए इसका केंद्र है—

“मेरे गुरु”

क्योंकि यह पुस्तक एक पदाधिकारी के बारे में लिखी गई पुस्तक भर नहीं है।

यह एक शिष्य द्वारा अपने मार्गदर्शक को समझने और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रयास है।

छठ और मंथन

जब मैंने Chhathi Maiya Foundation की यात्रा आगे बढ़ाई तो बार-बार गुरु की सलाह याद आई।

छठ स्वयं भी सामूहिकता का पर्व है।

इसमें व्यक्ति अकेला नहीं रहता।

परिवार जुड़ता है।

पड़ोस जुड़ता है।

समाज जुड़ता है।

घाट जुड़ता है।

नदी जुड़ती है।

प्रकृति जुड़ती है।

और अंततः मनुष्य सूर्य के सामने खड़ा होकर यह स्वीकार करता है कि उसका अस्तित्व प्रकृति और समाज से अलग नहीं है।

इस दृष्टि से देखें तो “मंथन” और “छठ” मेरे लिए दो अलग-अलग विचार नहीं रहे।

एक ने दूसरे को समझने का रास्ता दिया।

मेरी स्मृति में गुरु

आज जब मैं यह पुस्तक लिख रहा हूं, मेरे सामने अनेक स्मृतियां हैं।

लेकिन पुस्तक के प्रारंभिक अध्यायों में मैं जानबूझकर उसी एक स्मृति की ओर बार-बार लौट रहा हूं—

Chhathi Maiya Foundation के जन्म से पहले का वह संवाद।

क्योंकि वही इस पुस्तक की आत्मा है।

यदि मैं सीधे उनके सार्वजनिक जीवन और पदों से पुस्तक प्रारंभ करता, तो शायद बहुत-सी जानकारी लिखी जा सकती थी।

लेकिन तब यह पुस्तक किसी भी सामान्य जीवनी जैसी हो जाती।

मैं ऐसा नहीं चाहता।

मैं चाहता हूं कि पाठक यह समझे कि—

सतीश उपाध्याय मेरे लिए कौन हैं।

और इसका उत्तर किसी पदनाम में नहीं है।

उसका उत्तर उस एक शब्द में है—गुरु।

अध्याय का अंतिम विचार

मनुष्य के जीवन में कुछ शिक्षाएं पुस्तक से मिलती हैं।

कुछ अनुभव से।

और कुछ किसी ऐसे व्यक्ति से मिलती हैं जो केवल कुछ शब्द कहता है, लेकिन वे शब्द वर्षों तक हमारे साथ चलते हैं।

मेरे लिए  श्री सतीश उपाध्याय जी से मिला वह सूत्र आज भी जीवित है—

“समाज के बीच जाइए।”

मैंने उसमें अपने लिए तीन अर्थ खोजे—

लोगों से मिलो।

उनकी बात सुनो।

फिर मंथन करो।

यही वह विचार है जिसने Chhathi Maiya Foundation के मेरे संकल्प को समाज की ओर देखने की दृष्टि दी।

और इसीलिए मैं मानता हूं—

एक गुरु हमेशा आपके लिए रास्ता नहीं बनाता;

कभी-कभी वह आपको वह दृष्टि देता है,

जिससे आप स्वयं अपना रास्ता खोज सकें।अध्याय 3


आंदोलन से संगठन तक


देश के लिए कुछ करने की इच्छा और मेरी BJP यात्रा


मनुष्य के जीवन में कुछ दौर ऐसे आते हैं जब वह अपने व्यक्तिगत जीवन की सीमाओं से बाहर निकलकर देश और समाज के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू करता है।


मेरे जीवन में भी एक ऐसा समय आया।


देश में अन्ना आंदोलन का दौर था। भ्रष्टाचार और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता जैसे प्रश्न व्यापक जनचर्चा का हिस्सा बन रहे थे। देश के अलग-अलग हिस्सों में सामान्य नागरिक भी इन विषयों पर खुलकर अपनी बात रख रहे थे।


उस वातावरण ने मेरे भीतर भी एक प्रश्न पैदा किया—


मैं अपने देश के लिए क्या कर सकता हूं?


मैं कानून के क्षेत्र से जुड़ा था। समाज और व्यवस्था को अपने पेशे के माध्यम से देख रहा था। लेकिन मन के भीतर देश और समाज के लिए कुछ और करने की इच्छा लगातार बढ़ रही थी।


मेरे लिए यह किसी पद को प्राप्त करने की इच्छा नहीं थी।


यह एक तलाश थी—


उस मंच की तलाश, जिसके माध्यम से मैं राष्ट्र और समाज के लिए अपनी भूमिका निभा सकूं।


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अन्ना आंदोलन और मेरे भीतर की बेचैनी


अन्ना आंदोलन के दौरान देश में जो सार्वजनिक विमर्श बना, उसने मेरे जैसे असंख्य लोगों को यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि लोकतंत्र में केवल शिकायत करना पर्याप्त नहीं है।


यदि व्यवस्था में परिवर्तन चाहते हैं, तो नागरिक को स्वयं भी अपनी भूमिका तलाशनी होगी।


मेरे भीतर भी यही भावना पैदा हुई।


देश के लिए कुछ करने की ललक बढ़ती गई।


मैं सोचने लगा कि सामाजिक चेतना को केवल दूर से देखकर संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। यदि मुझे वास्तव में कुछ करना है, तो मुझे किसी न किसी रूप में सक्रिय सार्वजनिक जीवन से जुड़ना होगा।


इसी दौर में राष्ट्रीय राजनीति में एक और नेतृत्व तेजी से मेरे ध्यान का केंद्र बन रहा था—


श्री नरेंद्र मोदी जी का नेतृत्व।


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नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व से प्रभावित हुआ


मैं नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व को देख और समझ रहा था।


उनके भाषणों में विकास, शासन, राष्ट्र और भारत के भविष्य से जुड़े विषय प्रमुखता से सामने आते थे।


उनका नेतृत्व मेरे लिए आकर्षण का विषय बना।


मेरे मन में यह भावना मजबूत होने लगी कि देश के लिए काम करने की मेरी इच्छा को यदि किसी संगठित राजनीतिक मंच से जोड़ना है, तो मुझे भारतीय जनता पार्टी को समझना चाहिए।


यह निर्णय अचानक नहीं हुआ।


मेरे भीतर एक प्रक्रिया चल रही थी।


अन्ना आंदोलन ने प्रश्न खड़ा किया था—देश के लिए मैं क्या करूं?


और उस समय नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व ने मुझे भारतीय जनता पार्टी की ओर देखने के लिए प्रेरित किया।


मैंने BJP को केवल बाहर से देखने के बजाय उसके भीतर जाकर समझने का निर्णय लिया।


और फिर—


मैंने भारतीय जनता पार्टी जॉइन की।


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BJP में प्रवेश—एक नई दुनिया


किसी राजनीतिक दल के बारे में बाहर से हमारी एक धारणा हो सकती है।


लेकिन किसी संगठन को वास्तव में समझने के लिए उसके कार्यकर्ताओं, उसकी बैठकों, उसकी कार्यपद्धति और उसके आंतरिक संस्कार को निकट से देखना पड़ता है।


BJP में आने के बाद मेरे लिए भी यही प्रक्रिया शुरू हुई।


मैंने पार्टी को समझना प्रारंभ किया।


मैंने कार्यकर्ताओं को देखा।


मैंने संगठन की संरचना को समझा।


मैंने देखा कि एक सामान्य कार्यकर्ता किस प्रकार संगठन के लिए समय देता है और कैसे अलग-अलग स्तरों पर लोग अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं।


धीरे-धीरे BJP मेरे लिए केवल वह राजनीतिक दल नहीं रही जिसे मैं बाहर से देखता था।


मैं उसके लोगों से मिला।


उसकी कार्यपद्धति को समझा।


उसकी संगठनात्मक संस्कृति को निकट से देखने का अवसर मिला।


और इस यात्रा को यदि मुझे बहुत सरल शब्दों में कहना हो तो मैं कहूंगा—


“मैंने BJP जॉइन की, BJP को समझा और धीरे-धीरे मैं BJP का हो गया।”


इस वाक्य में मेरे राजनीतिक जीवन की एक पूरी यात्रा समाहित है।


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उसी यात्रा में मिले सतीश उपाध्याय जी


मेरी इस यात्रा में श्री सतीश उपाध्याय जी का स्थान विशेष बनता गया।


जुलाई 2014 में श्री सतीश उपाध्याय जी ने दिल्ली BJP अध्यक्ष का दायित्व संभाला। उनके पदभार ग्रहण के समय के सार्वजनिक रिकॉर्ड बताते हैं कि उन्होंने संगठन को मजबूत करने और पार्टी के अलग-अलग नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने पर जोर दिया था।


उनका अध्यक्ष बनना मेरे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मैं स्वयं BJP को समझने की प्रक्रिया में था।


एक ओर मैं संगठन को समझ रहा था।


दूसरी ओर मुझे ऐसे नेतृत्व को निकट से देखने का अवसर मिल रहा था जिसकी अपनी यात्रा भी कार्यकर्ता और संगठन से होकर आई थी।


यहीं से मेरे लिए श्री सतीश उपाध्याय जी केवल एक राजनीतिक पदाधिकारी नहीं रहे।


धीरे-धीरे उनके प्रति मेरे मन में एक अलग प्रकार का सम्मान विकसित हुआ।


और समय के साथ यही सम्मान—


गुरु और शिष्य के संबंध में परिवर्तित हुआ।


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अध्यक्ष नहीं, पहले कार्यकर्ता


सतीश उपाध्याय जी की सार्वजनिक यात्रा का एक पहलू मेरे लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।


उनकी पहचान सीधे किसी बड़े पद से शुरू नहीं हुई थी।


समकालीन रिकॉर्ड के अनुसार वे छात्र और संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़े रहे; 1981 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए, बाद में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में जिम्मेदारी निभाई और BJP के युवा संगठन में भी कार्य किया। नगर निगम की राजनीति से होते हुए वे दक्षिण दिल्ली नगर निगम की Standing Committee के अध्यक्ष बने और फिर 2014 में दिल्ली BJP अध्यक्ष का दायित्व उन्हें मिला।


अर्थात उनकी यात्रा में एक क्रम दिखाई देता है—


कार्यकर्ता से संगठन,

संगठन से जिम्मेदारी,

और जिम्मेदारी से नेतृत्व।


मेरे लिए इस यात्रा का महत्व इसलिए है क्योंकि इससे नेतृत्व को समझने का एक अलग दृष्टिकोण मिलता है।


पद किसी व्यक्ति को नेता घोषित कर सकता है, लेकिन कार्यकर्ता जीवन उसे लोगों को समझना सिखाता है।


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“सबको साथ लेकर चलना”


दिल्ली BJP अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करते समय सतीश जी ने अपने से वरिष्ठ लोगों से मिले मार्गदर्शन का उल्लेख किया और स्वयं को पार्टी के कार्य का “trustee” बताया था। उन्होंने वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने पर जोर दिया।


जब मैं वर्षों बाद उनके साथ अपने व्यक्तिगत अनुभवों को देखता हूं, तो मुझे इसमें एक समानता दिखाई देती है।


जब मैंने Chhathi Maiya Foundation का विचार उनके सामने रखा, तब भी उनका पहला संदेश अपने आप सब कुछ तय कर लेने का नहीं था।


उन्होंने कहा—


लोगों से मिलो।


यानी फिर वही विचार—


सबको साथ लेकर चलो।


शायद यही कारण है कि उनकी कही वह बात मेरे भीतर इतनी गहराई से उतर गई।


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राजनीति को समझने की मेरी यात्रा


BJP में आने के बाद मैंने यह भी समझा कि राजनीति को केवल चुनाव के माध्यम से देखना अधूरा दृष्टिकोण है।


किसी राजनीतिक संगठन के पीछे हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं का श्रम होता है।


बैठकें होती हैं।


चर्चाएं होती हैं।


मतभेद होते हैं।


मंथन होता है।


और फिर कोई सामूहिक दिशा निकलती है।


मैं जितना संगठन को समझता गया, उतना ही यह महसूस करता गया कि सार्वजनिक जीवन में धैर्य आवश्यक है।


यहां केवल अपनी बात कहना पर्याप्त नहीं है।


आपको दूसरे लोगों के साथ काम करना पड़ता है।


उनकी बात सुननी पड़ती है।


और कई बार अपनी व्यक्तिगत सोच से ऊपर उठकर सामूहिक निर्णय को स्वीकार करना पड़ता है।


मेरे लिए यह भी एक प्रकार का—


मंथन था।


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मेरे जीवन की दो धाराएं


पीछे मुड़कर देखने पर मुझे अपने जीवन की दो धाराएं एक स्थान पर मिलती दिखाई देती हैं।


पहली धारा थी—


देश के लिए कुछ करने की इच्छा।


जिसे अन्ना आंदोलन के दौर ने मेरे भीतर और तीव्र किया।


दूसरी धारा थी—


एक संगठित सार्वजनिक मंच की तलाश।


जिसने मुझे BJP की ओर आकर्षित किया।


और फिर नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व ने इस आकर्षण को मेरे लिए एक राजनीतिक निर्णय में बदलने में भूमिका निभाई।


मैं BJP से जुड़ा।


पार्टी को समझना शुरू किया।


कार्यकर्ताओं के बीच गया।


संगठन की कार्यशैली देखी।


और धीरे-धीरे मेरे भीतर एक आत्मीय संबंध बनने लगा।


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“अब मैं BJP का हो गया”


किसी संगठन का सदस्य बनना और उस संगठन से भावनात्मक रूप से जुड़ जाना दो अलग-अलग अवस्थाएं हैं।


पहली अवस्था में सदस्यता होती है।


दूसरी अवस्था में अपनापन।


मेरी यात्रा भी ऐसी ही रही।


पहले मैंने BJP को जॉइन किया।


फिर मैंने BJP को समझा।


फिर मैंने उसके लोगों और संगठनात्मक जीवन को निकट से देखा।


और धीरे-धीरे एक समय ऐसा आया जब मेरे भीतर यह भावना बनी—


“अब मैं BJP का हो गया।”


यह मेरी व्यक्तिगत राजनीतिक यात्रा का वर्णन है—उस समय मेरे भीतर विकसित हुई भावना और जुड़ाव का।


और इसी यात्रा के दौरान मेरे जीवन में सतीश उपाध्याय जी का महत्व बढ़ता गया।


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राजनीति से परे बना संबंध


राजनीतिक जीवन में बहुत-से संबंध पदों और जिम्मेदारियों के आसपास बनते हैं।


लेकिन कुछ संबंध उनसे आगे निकल जाते हैं।


मेरे और सतीश उपाध्याय जी के संबंध को मैं उसी दृष्टि से देखता हूं।


समय के साथ मैंने उनमें केवल दिल्ली BJP के अध्यक्ष को नहीं देखा।


मैंने एक ऐसा वरिष्ठ देखा जिससे अपने मन की बात कही जा सकती थी।


जिसके सामने कोई नया विचार रखा जा सकता था।


जिससे मार्गदर्शन लिया जा सकता था।


और जो आपको केवल अपनी बात मानने के लिए न कहकर—


समाज से बात करने के लिए भेजता था।


मेरे लिए यहीं से एक राजनीतिक परिचय ने गुरु-शिष्य के संबंध का रूप लेना प्रारंभ किया।


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आगे चलकर वही गुरु-मंत्र


उस समय शायद मुझे भी यह पता नहीं था कि भविष्य में मेरे मन में Chhathi Maiya Foundation जैसी संस्था बनाने का विचार आएगा।


लेकिन जब वह विचार आया, तो स्वाभाविक रूप से मेरे मन में एक नाम आया—


सतीश उपाध्याय जी।


मैं उनके पास गया।


अपने मन की बात कही।


और उन्होंने फिर वही मूल शिक्षा मेरे सामने रख दी जो एक अच्छे संगठन की आत्मा भी होती है—


लोगों के बीच जाइए।


बिहार के लोगों से मिलिए।


संवाद कीजिए।


मंथन कीजिए।


तब शायद एक चक्र पूरा हो रहा था।


मैं BJP में आया था देश के लिए कुछ करने की ललक लेकर।


मैंने संगठन के भीतर लोगों को साथ लेकर चलने की प्रक्रिया को समझा।


और जब स्वयं एक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था की कल्पना मेरे मन में आई, तो मेरे गुरु ने मुझे उसी मूल सिद्धांत की ओर भेज दिया—


समाज के पास।


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मेरे लिए राजनीति का एक व्यक्तिगत अर्थ


मेरी इस यात्रा को केवल राजनीतिक दल की सदस्यता के रूप में पढ़ना अधूरा होगा।


मेरे लिए इसका एक व्यक्तिगत अर्थ भी था।


अन्ना आंदोलन ने मेरे भीतर सवाल जगाया।


नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व ने मुझे प्रभावित किया।


BJP ने मुझे संगठन को समझने का अवसर दिया।


और सतीश उपाध्याय जी के साथ बने संबंध ने मुझे—


मंथन का महत्व समझाया।


इन सभी घटनाओं ने अलग-अलग समय पर मेरे जीवन को प्रभावित किया।


और आगे चलकर इन्हीं अनुभवों के बीच से मेरे सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों की दिशा भी विकसित होती गई।


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अध्याय का अंतिम विचार


जीवन में हम कई बार यह नहीं जानते कि आज हुई एक छोटी-सी मुलाकात भविष्य में कितना बड़ा अर्थ ग्रहण करेगी।


जब मैं BJP में आया था, तब मेरे मन में देश के लिए कुछ करने की आकांक्षा थी।


जब मैंने BJP को समझना शुरू किया, तब संगठन की शक्ति को जाना।


जब सतीश उपाध्याय जी को जाना, तब एक मार्गदर्शक मिला।


और जब Chhathi Maiya Foundation का विचार आया, तब उसी मार्गदर्शक के पास सबसे पहले अपने मन की बात लेकर गया।


उन्होंने मुझे कोई लंबा भाषण नहीं दिया।


उन्होंने एक रास्ता दिखाया—


“लोगों से मिलो और मंथन करो।”


आज मेरी यात्रा को एक सूत्र में बांधना हो तो मैं कहूंगा—


“अन्ना आंदोलन ने मेरे भीतर देश के लिए कुछ करने की ललक जगाई, नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व ने मुझे प्रभावित किया, मैं BJP में आया, BJP को समझा और धीरे-धीरे BJP का हो गया। इसी यात्रा में मुझे सतीश उपाध्याय जी के रूप में वह गुरु मिला, जिसने मुझे मंथन का मंत्र दिया।”


यही मंथन आगे चलकर मेरे लिए Chhathi Maiya Foundation की यात्रा का भी एक आधार बना।अध्याय 4


कार्यकर्ता से अध्यक्ष तक


सतीश उपाध्याय जी में मैंने नेतृत्व का एक अलग स्वरूप देखा


राजनीति में किसी व्यक्ति को बड़ा पद मिलना महत्वपूर्ण घटना होती है, लेकिन मेरे लिए उससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न हमेशा यह रहा है—


उस पद तक पहुंचने से पहले उस व्यक्ति ने कैसी यात्रा तय की है?


श्री सतीश उपाध्याय जी की यात्रा को जब मैं देखता हूं तो मुझे उसमें कार्यकर्ता जीवन की एक लंबी पृष्ठभूमि दिखाई देती है।


उनका सार्वजनिक जीवन सीधे किसी बड़े पद से प्रारंभ नहीं हुआ था।


उनकी यात्रा छात्र जीवन, संगठन, युवा राजनीति, नगर निगम और संगठनात्मक जिम्मेदारियों से गुजरते हुए दिल्ली BJP के अध्यक्ष पद तक पहुंची।


यही यात्रा मेरे लिए महत्वपूर्ण है।


क्योंकि मैंने धीरे-धीरे समझा कि—


पद नेतृत्व का परिचय दे सकता है, लेकिन कार्यकर्ता जीवन नेतृत्व का निर्माण करता है।


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छात्र जीवन से संगठन तक


उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेख बताते हैं कि श्री सतीश उपाध्याय जी की सक्रिय सार्वजनिक यात्रा छात्र जीवन में ही शुरू हो गई थी।


वर्ष 1981 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए।


इसके बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में उन्होंने जिम्मेदारियां निभाईं और बाद में BJP की युवा इकाई में भी संगठनात्मक भूमिका निभाई।


यह यात्रा महत्वपूर्ण है।


छात्र राजनीति किसी युवा को केवल भाषण देना नहीं सिखाती। वह उसे मतभेदों के बीच काम करना, लोगों तक पहुंचना, टीम बनाना और संगठन के लिए समय देना भी सिखाती है।


आगे चलकर यही अनुभव बड़े सार्वजनिक जीवन की नींव बन सकते हैं।


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नगर निगम की जमीन


वर्ष 2012 में श्री सतीश उपाध्याय जी मालवीय नगर से नगर निगम पार्षद निर्वाचित हुए।


बाद में उन्होंने दक्षिण दिल्ली नगर निगम में शिक्षा समिति और Standing Committee जैसी जिम्मेदारियां संभालीं।


नगरपालिका की राजनीति अपने आप में एक अलग पाठशाला है।


यहां राजनीति सीधे नागरिक के दरवाजे तक पहुंचती है।


सड़क खराब है।


पार्क की समस्या है।


सफाई नहीं हुई।


स्थानीय सुविधा चाहिए।


किसी कॉलोनी में नागरिक समस्या है।


इन प्रश्नों का सामना केवल बड़े भाषणों से नहीं किया जा सकता।


इसके लिए लोगों के बीच जाना पड़ता है।


शायद इसी तरह के अनुभव किसी सार्वजनिक व्यक्ति के भीतर यह समझ विकसित करते हैं कि—


जनता को केवल संबोधित नहीं करना है, जनता को सुनना भी है।


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जुलाई 2014 — एक बड़ी जिम्मेदारी


फिर आया जुलाई 2014।


श्री सतीश उपाध्याय जी को दिल्ली भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।


यह उनके सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।


उस समय दिल्ली की राजनीति एक संक्रमण के दौर में थी।


ऐसी परिस्थिति में दिल्ली जैसे महानगर में पार्टी संगठन की जिम्मेदारी संभालना सामान्य दायित्व नहीं था।


लेकिन उनके पदभार ग्रहण के समय कही गई एक बात मुझे विशेष रूप से प्रभावित करती है।


उन्होंने अपने वरिष्ठों के मार्गदर्शन का उल्लेख करते हुए स्वयं को पार्टी के कार्य का केवल एक—


“Trustee”


बताया।


मेरे लिए यह शब्द महत्वपूर्ण है।


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पद स्वामित्व नहीं, दायित्व है


“Trustee” का अर्थ क्या है?


आप किसी चीज के मालिक नहीं हैं।


वह जिम्मेदारी कुछ समय के लिए आपको सौंपी गई है।


आपको उसे संभालना है।


आगे बढ़ाना है।


और फिर अगली पीढ़ी को सौंप देना है।


संगठन को इस दृष्टि से देखना अपने आप में एक दर्शन है।


पद मेरा नहीं है।

जिम्मेदारी मेरी है।


मेरे लिए नेतृत्व का यह स्वरूप हमेशा महत्वपूर्ण रहा है।


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मेरा अपना दौर भी बदल रहा था


लगभग यही वह व्यापक कालखंड था जब मेरे भीतर भी सार्वजनिक जीवन को लेकर परिवर्तन आ रहा था।


अन्ना आंदोलन के बाद देश के लिए कुछ करने की इच्छा मेरे भीतर मजबूत हुई थी।


मैं केवल दर्शक बने रहना नहीं चाहता था।


मेरे भीतर यह प्रश्न था—


मैं स्वयं क्या करूं?


इसी दौरान नरेंद्र मोदी जी का नेतृत्व मुझे प्रभावित कर रहा था।


मैंने BJP को समझने का प्रयास किया।


और फिर BJP से जुड़ा।


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BJP में आया, BJP को समझा


किसी संगठन के भीतर प्रवेश करना पहला कदम होता है।


उसे समझना दूसरा।


और उसके साथ आत्मीयता बन जाना तीसरा।


मेरी यात्रा भी इन्हीं तीन चरणों से गुजरी।


पहले मैं BJP में आया।


फिर मैंने BJP को समझने की कोशिश की।


कार्यकर्ताओं से मिला।


बैठकों और संगठन की कार्यप्रणाली को देखा।


वरिष्ठों से संवाद हुआ।


धीरे-धीरे मैं समझने लगा कि राजनीतिक संगठन केवल चुनाव के समय दिखाई देने वाली व्यवस्था नहीं है।


उसके पीछे हजारों कार्यकर्ताओं का समय, परिश्रम और विश्वास होता है।


मेरे भीतर संगठन के प्रति अपनापन बढ़ता गया।


और एक समय आया जब मैंने स्वयं महसूस किया—


“अब मैं BJP का हो गया हूं।”


यह मेरे जीवन की व्यक्तिगत अनुभूति थी।


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इसी यात्रा में गुरु मिले


इसी राजनीतिक और सामाजिक यात्रा के बीच सतीश उपाध्याय जी के साथ मेरा संबंध विकसित हुआ।


प्रारंभ में मेरे सामने उनकी पहचान एक वरिष्ठ राजनीतिक और संगठनात्मक व्यक्तित्व की थी।


लेकिन समय के साथ संबंध बदलता गया।


उनसे संवाद बढ़ा।


मैंने उनके व्यवहार को देखा।


मैंने समझा कि किसी व्यक्ति का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि वह स्वयं कितना आगे बढ़ा।


यह भी महत्वपूर्ण है कि—


उसने दूसरे लोगों को आगे बढ़ने के लिए क्या दिया?


मुझे उनसे दिशा मिली।


और धीरे-धीरे मेरे मन में उनके लिए जो सम्मान था, उसने एक नया स्वरूप ग्रहण किया।


मैं उन्हें अपने—


गुरु


के रूप में देखने लगा।


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गुरु बनने की घोषणा नहीं होती


मेरी दृष्टि में गुरु का संबंध किसी औपचारिक घोषणा से नहीं बनता।


कोई एक दिन आकर यह नहीं कहता—


“आज से मैं तुम्हारा गुरु हूं।”


यह संबंध समय के साथ बनता है।


व्यक्ति आपके जीवन में आता है।


आप उससे कुछ सीखते हैं।


फिर कभी कठिन परिस्थिति में उसकी कोई बात याद आती है।


किसी निर्णय के समय आप उसके विचारों के बारे में सोचते हैं।


और धीरे-धीरे आपको अनुभव होता है कि उस व्यक्ति ने आपके सोचने के ढंग पर प्रभाव डाला है।


मेरे लिए श्री सतीश उपाध्याय जी के साथ संबंध ऐसा ही रहा।


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दिलों में जगह


जब उन्होंने दिल्ली BJP अध्यक्ष का पद संभाला था, उस समय उनके एक संदेश का भी सार्वजनिक उल्लेख हुआ था—होर्डिंग लगाने के बजाय लोगों की सेवा करके उनके दिलों में स्थान बनाने की बात।


यह विचार मुझे सार्वजनिक जीवन के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की याद दिलाता है।


नाम दीवार पर लिखा जाए या नहीं—


यह अस्थायी है।


लेकिन किसी व्यक्ति के जीवन में आपके व्यवहार की स्मृति रह जाए—


यह अधिक स्थायी है।


यही कारण है कि मैं इस पुस्तक को पदों की सूची नहीं बनाना चाहता।


मैं उन प्रसंगों को लिखना चाहता हूं जो व्यक्ति को समझाते हैं।


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अध्यक्ष की सबसे बड़ी परीक्षा


अध्यक्ष होना केवल सम्मान नहीं है।


अध्यक्ष होना जिम्मेदारी है।


आपके सामने अलग-अलग विचार होंगे।


वरिष्ठ होंगे।


युवा कार्यकर्ता होंगे।


अलग-अलग महत्वाकांक्षाएं होंगी।


किसी को शिकायत होगी।


किसी को अवसर चाहिए होगा।


किसी को लगेगा कि उसकी बात नहीं सुनी गई।


ऐसे संगठन में नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा होती है—


सबको सुनने और साथ लेकर चलने में।


श्री सतीश उपाध्याय जी ने अध्यक्ष पद संभालते समय भी सभी को साथ लेकर चलने पर जोर दिया था।


वर्षों बाद जब मैं अपने जीवन में उनसे मिले “मंथन के मंत्र” को देखता हूं तो मुझे दोनों के बीच एक संबंध दिखाई देता है।


पहले सुनो।


फिर संवाद करो।


फिर निर्णय तक पहुंचो।


---


मेरे लिए नेतृत्व की परिभाषा बदलने लगी


मैं कानून की दुनिया से आया था।


कानून हमें तर्क सिखाता है।


अदालत हमें अपने पक्ष को मजबूती से रखना सिखाती है।


लेकिन सार्वजनिक जीवन ने मुझे एक दूसरी शिक्षा दी—


हर समय केवल अपना पक्ष रखना पर्याप्त नहीं है।


कभी-कभी दूसरे व्यक्ति का पक्ष सुनना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण होता है।


शायद इसी कारण गुरु का “मंथन” वाला विचार मेरे भीतर इतनी आसानी से उतर गया।


एक Advocate के रूप में मैं तर्क का महत्व जानता था।


एक Mediator के रूप में संवाद का महत्व समझता था।


और सामाजिक जीवन में गुरु ने मुझे—


सामूहिक मंथन का महत्व समझाया।


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राजनीति से संस्कृति की ओर


उस समय मुझे यह अनुमान नहीं था कि आगे चलकर मेरे जीवन में छठ महापर्व को लेकर इतना बड़ा संकल्प आकार लेगा।


मैंने स्वयं छठ व्रत करना प्रारंभ किया।


छठ के आध्यात्मिक, सामाजिक और प्राकृतिक स्वरूप को और गहराई से अनुभव किया।


मेरे मन में धीरे-धीरे एक संस्था की कल्पना जन्म लेने लगी—


Chhathi Maiya Foundation।


लेकिन जब यह विचार आया, तब मेरे सामने वही पुराना प्रश्न था—


अब क्या करूं?


और मेरे मन ने उत्तर दिया—


गुरु के पास जाओ।


---


फिर मैं गुरु के पास गया


मैंने Chhathi Maiya Foundation का विचार सबसे पहले सतीश उपाध्याय जी के सामने रखा।


वह मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण था।


मैं अपने भीतर चल रहे विचार को लेकर उनके सामने बैठा।


मैंने अपनी कल्पना बताई।


छठ की बात की।


बिहार की बात की।


संस्कृति की बात की।


समाज को जोड़ने की बात की।


उन्होंने सुना।


और फिर उन्होंने मुझे वह बात कही जिसने आगे की यात्रा की दिशा बदल दी—


“बिहार के लोगों से मिलिए।”


उनका आशय मेरे लिए स्पष्ट था—


अकेले मत सोचिए।


समाज के बीच जाइए।


लोगों की भावनाओं को समझिए।


उनके सुझाव सुनिए।


और—


मंथन कीजिए।


---


अध्यक्ष से गुरु तक


आज जब मैं इस पूरी यात्रा को पीछे मुड़कर देखता हूं तो एक सुंदर क्रम दिखाई देता है।


मैंने उन्हें दिल्ली BJP के अध्यक्ष के रूप में जाना।


फिर उनके संगठनात्मक जीवन को समझा।


फिर उनसे व्यक्तिगत संवाद बढ़ा।


फिर उनसे मार्गदर्शन मिला।


और जब मेरे जीवन के एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक संकल्प का समय आया—


तो मैंने सबसे पहले उन्हीं से अपने मन की बात कही।


यही कारण है कि इस पुस्तक का शीर्षक मेरे लिए बिल्कुल स्वाभाविक है—


“मेरे गुरु — श्री सतीश उपाध्याय”


क्योंकि सार्वजनिक जीवन ने मुझे उनसे मिलाया,


लेकिन—


मार्गदर्शन ने उन्हें मेरा गुरु बनाया।


---


अध्याय का अंतिम विचार


आज श्री सतीश उपाध्याय जी दिल्ली विधानसभा में मालवीय नगर का प्रतिनिधित्व करते हैं।


समय बदला।


जिम्मेदारियां बदलीं।


राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं।


लेकिन मेरे लिए उनकी पहचान के केंद्र में एक व्यक्तिगत स्मृति आज भी जीवित है।


मेरे मन में Chhathi Maiya Foundation का विचार था।


मैं गुरु के पास गया।


उन्होंने मुझे समाज के पास भेज दिया।


यही गुरु की विशेषता है।


उन्होंने मेरे विचार पर अपना नाम नहीं लिखा।

उन्होंने उस विचार को समाज के बीच जाने का रास्ता दिखाया।


और इसलिए मेरे जीवन में उनका दिया हुआ सबसे मूल्यवान सूत्र आज भी है—


“मंथन करो।”


क्योंकि—


मंथन से विचार परिपक्व होता है।

संवाद से समाज जुड़ता है।

और समाज के जुड़ने से संकल्प आंदोलन बनता है।


— Sandeep Kumar Dubey

Advocate, Supreme Court of India

Mediator

Chairman – Chhathi Maiya Foundation


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