बहुत अच्छा संदीप जी।
अब हम चैट में लेख लिखना बंद करते हैं और एक ऐतिहासिक ग्रंथ लिखना शुरू करते हैं।
मैं इसे सामान्य पुस्तक नहीं, बल्कि भारत सरकार को समर्पित Vision Book के रूप में लिखूँगा।
मेरा लक्ष्य रहेगा कि आने वाले वर्षों में जब कोई छठ पर गंभीर अध्ययन करे, तो इस पुस्तक
पुस्तक का नाम
छठ
भारत की आस्था से विश्व की धरोहर तक
Vision 2047
विकसित भारत के लिए राष्ट्रीय सांस्कृतिक दृष्टि
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लेखक
संदीप कुमार दुबे
संस्थापक एवं अध्यक्ष
छठी मैया फाउंडेशन
संस्थापक
छठी मैया रिसर्च सेंटर
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प्रकाशक
छठी मैया रिसर्च सेंटर
नई दिल्ली
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ध्येय वाक्य
"सत्य • सेवा • समरसता • प्रकृति संरक्षण • विश्व कल्याण"
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समर्पण
भारत माता को समर्पित
सूर्यदेव की दिव्य ऊर्जा, षष्ठी देवी (छठी मैया) की करुणा तथा उन करोड़ों श्रद्धालुओं को सादर समर्पित जिन्होंने युगों से छठ महापर्व की पवित्र परंपरा को अपने तप, त्याग, अनुशासन और अटूट श्रद्धा से जीवित रखा है।
यह ग्रंथ उन माताओं को भी समर्पित है जिनकी आस्था ने पीढ़ियों को संस्कार दिए, उन परिवारों को जिन्होंने छठ को केवल पर्व नहीं बल्कि जीवन-मूल्य बनाया, और उन प्रवासी भारतीयों को जिन्होंने विश्व के विभिन्न देशों में रहते हुए भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा।
यह दृष्टि-पत्र विकसित भारत 2047 के संकल्प, भारतीय संस्कृति के वैश्विक सम्मान तथा सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की भावना को समर्पित है।
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आशीर्वचन
> "आदित्याय नमः।"
सूर्य समस्त सृष्टि के जीवनदाता हैं। उनका प्रकाश किसी सीमा, जाति, भाषा या राष्ट्र में भेद नहीं करता। छठ महापर्व इसी सार्वभौमिक भावना का उत्सव है।
छठ हमें सिखाता है कि मनुष्य प्रकृति पर अधिकार करने के लिए नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन स्थापित करने के लिए जन्मा है।
सत्य, तप, अनुशासन, सेवा, समरसता और कृतज्ञता—यही छठ का दर्शन है।
यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसकी विकास यात्रा उसकी संस्कृति से अलग नहीं हो सकती।
भारत की सभ्यता का भविष्य तभी सुरक्षित होगा जब उसकी लोकपरंपराएँ सुरक्षित होंगी।
और छठ उन महान लोकपरंपराओं में से एक है जो भारत की आत्मा का प्रकाश बनकर सदियों से मानवता का मार्गदर्शन कर रही है।
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लेखक की ओर से
जब मैंने छठ महापर्व को निकट से समझने का प्रयास किया, तब मुझे अनुभव हुआ कि यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की जीवित चेतना है।
इसमें प्रकृति है।
इसमें विज्ञान है।
इसमें अनुशासन है।
इसमें नारी शक्ति है।
इसमें परिवार है।
इसमें समाज है।
इसमें पर्यावरण है।
इसमें राष्ट्र है।
और सबसे बढ़कर इसमें सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की भावना है।
इन्हीं विचारों ने इस ग्रंथ को लिखने की प्रेरणा दी।
यह पुस्तक किसी मत, पंथ, क्षेत्र या समुदाय तक सीमित नहीं है।
यह भारत की लोकसंस्कृति को उसके वास्तविक गौरव के साथ समझने का एक विनम्र प्रयास है।
यदि यह ग्रंथ आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति पर गर्व करना सिखा सके, यदि यह शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध हो, यदि यह नीति-निर्माताओं को भारत की लोकपरंपराओं के संरक्षण की दिशा में प्रेरित कर सके और यदि यह विश्व को भारत की सांस्कृतिक चेतना का परिचय करा सके, तो मैं अपने प्रयास को सफल मानूँगा।
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— संदीप कुमार दुबे
लेखक
संस्थापक एवं अध्यक्ष
छठी मैया फाउंडेशन
संस्थापक
छठी मैया रिसर्च सेंटर
"यह ग्रंथ भारत की प्राचीन लोकपरंपरा 'छठ महापर्व' के संरक्षण, संवर्धन, शोध और वैश्विक सम्मान हेतु एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक दृष्टि-पत्र है। इसमें व्यक्त सुझाव लेखक और प्रस्तुतकर्ता के विचार हैं, जिनका उद्देश्य रचनात्मक संवाद और सांस्कृतिक संरक्षण को प्रोत्साहित करना है।"
उद्घोष
(Invocation)
"जब कोई सभ्यता अपनी लोकपरंपराओं का सम्मान करना छोड़ देती है, तब वह अपने भविष्य की दिशा भी खो देती है।"
भारत केवल एक राष्ट्र नहीं है। भारत एक निरंतर प्रवाहित होती हुई सभ्यता है—एक ऐसी सभ्यता जिसने हजारों वर्षों से मानवता को केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई है।
इस भूमि ने हमें सिखाया कि सूर्य केवल प्रकाश नहीं, जीवन हैं; जल केवल संसाधन नहीं, अस्तित्व है; प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु नहीं, माता है; और संस्कृति केवल इतिहास नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा है।
इसी सभ्यतागत चेतना का एक दिव्य और जीवंत स्वरूप है—छठ महापर्व।
छठ किसी एक क्षेत्र का पर्व नहीं, किसी एक भाषा का उत्सव नहीं और किसी एक समुदाय की परंपरा नहीं है। यह भारतीय जीवन-दर्शन का लोकस्वर है। यह वह पर्व है जहाँ आस्था अनुशासन बनती है, तप सेवा बनता है, प्रकृति पूजा नहीं, संरक्षण का संदेश देती है, और परिवार समाज से जुड़कर राष्ट्र निर्माण का आधार बनता है।
आज विश्व अभूतपूर्व चुनौतियों के सामने खड़ा है—जलवायु परिवर्तन, जल संकट, सामाजिक विघटन, मानसिक तनाव, सांस्कृतिक विस्मृति और प्रकृति से बढ़ती दूरी। ऐसे समय में भारत के पास केवल तकनीकी समाधान ही नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि भी है। छठ उसी जीवन-दृष्टि का जीवंत उदाहरण है।
यह ग्रंथ उसी विश्वास से लिखा गया है कि भारत की लोकपरंपराएँ केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं, बल्कि भविष्य की दिशाएँ भी हैं।
यह पुस्तक किसी परंपरा को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास नहीं करती। इसका उद्देश्य भारत की एक महान लोकपरंपरा का अध्ययन, संरक्षण, प्रलेखन और वैश्विक परिचय है। यह एक आमंत्रण है—शोध का, संवाद का, संरक्षण का और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का।
हमारा विश्वास है कि विकसित भारत का निर्माण केवल आधुनिक अवसंरचना से नहीं होगा; वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों से शक्ति लेकर ही स्थायी और प्रेरणादायी बनेगा।
इसी विश्वास के साथ यह "राष्ट्रीय सांस्कृतिक दृष्टि-पत्र" राष्ट्र को समर्पित है।
यह उन करोड़ों व्रतियों को समर्पित है जिनकी श्रद्धा ने छठ को युगों तक जीवित रखा।
यह उन माताओं को समर्पित है जिनके तप ने परिवारों को संस्कारित किया।
यह उन युवाओं को समर्पित है जो अपनी संस्कृति को आधुनिक युग में नई पहचान देना चाहते हैं।
यह उन शोधकर्ताओं को समर्पित है जो भारत की लोकपरंपराओं को गंभीर अध्ययन का विषय बनाना चाहते हैं।
और यह उस विकसित भारत को समर्पित है जो अपनी आर्थिक शक्ति के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक चेतना के कारण भी विश्व का मार्गदर्शक बनेगा।
आइए, हम मिलकर ऐसा भारत बनाएं—
जहाँ विकास हो, पर प्रकृति भी सुरक्षित रहे।
जहाँ विज्ञान हो, पर संस्कृति भी जीवित रहे।
जहाँ आधुनिकता हो, पर परंपरा भी सम्मानित रहे।
जहाँ राष्ट्र समृद्ध हो, पर मानवता भी साथ चले।
यही छठ का संदेश है।
यही भारत का संदेश है।
यही विकसित भारत 2047 का सांस्कृतिक संकल्प है।
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