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नई आध्यात्मिक चेतना है छठ” — संदीप दुबे

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“नई आध्यात्मिक चेतना है छठ” — संदीप दुबे “नई आध्यात्मिक चेतना है छठ” — यह विचार प्रख्यात अधिवक्ता संदीप कुमार दुबे द्वारा व्यक्त किया गया, जो छठ महापर्व के गहन आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व को दर्शाता है।   संदीप दुबे के अनुसार— छठ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक जागरण है, जो व्यक्ति को सत्य के मार्ग पर चलने, प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होने, और अनुशासन व तप के माध्यम से आत्मशुद्धि की प्रेरणा देता है। छठ: चेतना का उत्सव उनका मानना है कि— छठ में डूबते और उगते सूर्य दोनों को अर्घ्य देकर जीवन के हर पक्ष को स्वीकार करना सिखाया जाता है।  यह पर्व समानता, संयम और समर्पण का जीवंत उदाहरण है।  एक नई दिशा  यह संदेश आज के समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें बताता है कि— वास्तविक आध्यात्मिकता बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और प्रकृति के साथ सामंजस्य में निहित है। “छठ एक पर्व नहीं, बल्कि एक नई आध्यात्मिक चेतना है” — यह विचार समाज को जोड़ने, जागरूक करने और आत्मिक उन्नति की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

सत्य का उत्सव छठ

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सत्य का उत्सव (जीवन, प्रकाश और पुनर्जन्म का सनातन संदेश)लेखक: संदीप कुमार दुबे, अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय “सूर्य डूबता नहीं — बस दिशा बदलता है। यही छठ का सत्य है, यही जीवन का रहस्य।”  छठ — जीवन की पूर्णता का प्रतीक छठ महापर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन केवल भोग या तप नहीं, बल्कि संतुलन, सत्य और समर्पण का पथ है। यह पर्व आरंभ से अंत तक एक अदृश्य यात्रा है — शरीर से आत्मा तक, अंधकार से प्रकाश तक, अहम् से अस्तित्व तक। हर व्रती जब अर्घ्य देता है, तो वह केवल सूर्य को नहीं, बल्कि अपने जीवन के सत्य को अर्पित करता है। “छठ हमें यह नहीं सिखाती कि ईश्वर कहाँ है, बल्कि यह सिखाती है — कि सत्य हमारे भीतर ही ईश्वर है।” संध्या और उषा — जीवन के दो छोर छठ का दर्शन अद्भुत है — यह सूर्य के अस्त और उदय दोनों को समान श्रद्धा से पूजता है। यह सिखाता है कि जीवन का हर अंत केवल एक नया आरंभ है। जैसे सूर्य अस्त होकर भी पुनः उगता है, वैसे ही सत्य कभी समाप्त नहीं होता — वह बस नए रूप में लौटता है। “अस्त सूर्य भी उदय का वचन देता है।” संध्या अर्घ्य हमें सिखाता है विनम्रता, और उषा अर्घ्य सिखाता है विश्वा...

नागरिक कर्तव्य और शिष्टाचार – एक सशक्त राष्ट्र की पहचान

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नागरिक कर्तव्य और शिष्टाचार – एक सशक्त राष्ट्र की पहचान किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या संसाधनों से नहीं मापी जाती, बल्कि उसके नागरिकों के कर्तव्यबोध और शिष्टाचार से भी आंकी जाती है। एक जागरूक, जिम्मेदार और संस्कारित नागरिक ही एक मजबूत और विकसित समाज की नींव रखता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश में नागरिकों के अधिकारों की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन कर्तव्यों और शिष्टाचार की बात उतनी प्रमुखता से नहीं की जाती। जबकि लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती तभी संभव है जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समान रूप से निभाएं। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को कई मौलिक अधिकार दिए हैं, परंतु इसके साथ ही कुछ मौलिक कर्तव्यों का भी उल्लेख किया गया है। संविधान का सम्मान करना, कानून का पालन करना, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा करना, पर्यावरण का संरक्षण करना तथा सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। दुर्भाग्य से आज समाज में कई बार यह देखा जाता है कि लोग अपने अधिकारों के प्रति तो सजग रहते हैं, पर कर्तव्यों के पालन मे...

एक वर्ष का शासन – दिल्ली में रेखा सरकार की उपलब्धियाँ

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एक वर्ष का शासन – दिल्ली में रेखा सरकार की उपलब्धियाँ लेखक: संदीप कुमार दुबे, अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में रेखा सरकार को एक वर्ष पूर्ण हो चुका है। किसी भी सरकार के लिए पहला वर्ष दिशा और नीयत तय करने का वर्ष होता है। इस एक वर्ष में जो प्रयास दिखाई दिए हैं, वे यह संकेत देते हैं कि प्रशासनिक सुधार, जनसुविधा और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी गई है। सबसे पहले कानून–व्यवस्था और महिला सुरक्षा के विषय में ठोस पहल देखने को मिली है। सार्वजनिक स्थलों पर निगरानी व्यवस्था मजबूत करने, महिला सुरक्षा अभियानों को गति देने और नागरिक सहभागिता बढ़ाने का प्रयास किया गया है। राजधानी में सुरक्षा का वातावरण सुदृढ़ करना अत्यंत आवश्यक है, और इस दिशा में निरंतर कार्य होना चाहिए। दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र स्वच्छता और नगर प्रशासन रहा है। कूड़ा प्रबंधन, सड़कों की सफाई और नगर निकायों की कार्यप्रणाली में सुधार लाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। दिल्ली जैसे महानगर में स्वच्छता केवल सुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ा मूल प्रश्न है। गरीब, श्रमिक और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए योजनाओं के ब...

सरस्वती पूजा – शिक्षा, संस्कार और छात्र चेतना का महापर्व

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 सरस्वती पूजा – शिक्षा, संस्कार और छात्र चेतना का महापर्व Sandeep Kumar Dubey Advocate, Supreme Court of India.                                      सरस्वती पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की वह जीवंत परंपरा है जो शिक्षा, संस्कार और चरित्र निर्माण को समाज के केंद्र में स्थापित करती है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि विद्या केवल पुस्तकों का ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली शक्ति है। सरस्वती माता ज्ञान, बुद्धि, विवेक, वाणी और सृजन की देवी हैं। उनका श्वेत वस्त्र पवित्रता का, वीणा सृजनशीलता का, पुस्तक ज्ञान का और हंस विवेक का प्रतीक है। बिहार में सरस्वती पूजा को विशेष रूप से छात्रों का महापर्व माना जाता है। यहाँ यह पूजा केवल मंदिरों या विद्यालयों तक सीमित नहीं, बल्कि हर गली, हर मोहल्ले और हर छात्र के हृदय में बसती है। विद्यार्थी स्वयं पंडाल बनाते हैं, प्रतिमा स्थापित करते हैं, कार्यक्रम आयोजित करते हैं और पूरे समाज को एकता के सूत्र में बा...

Saraswati Puja: The Festival of Knowledge, Culture, and Student Consciousness

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Saraswati Puja: The Festival of Knowledge, Culture, and Student Consciousness By Sandeep Kumar Dubey, Advocate, Supreme Court of India Saraswati Puja is not merely a religious ritual; it is a living celebration of knowledge, culture, and moral consciousness. It represents the soul of Indian civilization where education is regarded as sacred and learning is considered a divine pursuit. Maa Saraswati, the goddess of wisdom, speech, intellect, and arts, symbolizes purity of thought, clarity of expression, and enlightenment of the mind. She is depicted in white attire, holding a veena, a book, and a rosary, seated on a lotus or a swan. Each symbol carries deep meaning. White represents purity, the veena symbolizes harmony and creativity, the book stands for knowledge, and the swan represents wisdom and discrimination between right and wrong. Maa Saraswati guides humanity from ignorance to enlightenment and from darkness to light. In Bihar, Saraswati Puja holds a unique and powe...

एक बिहारी, सब पर भारी : नितिन नवीन जी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना – राष्ट्र के लिए गौरव का क्षण

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एक बिहारी, सब पर भारी : नितिन नवीन जी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना – राष्ट्र के लिए गौरव का क्षण — संदीप कुमार दुबे, एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया “एक बिहारी, सब पर भारी” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि बिहार की उस परंपरा का प्रतीक है, जिसने हमेशा देश को नेतृत्व, साहस और संकल्प दिया है। आज जब श्री नितिन नवीन जी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं, तो यह क्षण केवल एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए गौरव और प्रेरणा का विषय है। बिहार की धरती बुद्ध, महावीर, चाणक्य और अशोक जैसे महान व्यक्तित्वों की जन्मस्थली रही है। यह वही भूमि है जिसने सदैव भारत को दिशा देने वाले नेतृत्व को जन्म दिया। नितिन नवीन जी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना उसी गौरवशाली परंपरा की निरंतरता है। यह सिद्ध करता है कि बिहार की मिट्टी में आज भी नेतृत्व की वही शक्ति और सामर्थ्य विद्यमान है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन में देश जिस आत्मनिर्भर, सशक्त और विकसित भारत की ओर अग्रसर है, उसमें नितिन नवीन जी का अनुभव, ऊर्जा और संगठनात्मक क्षमता नई गति प्रदान करेगी। उनका चयन यह दर्शात...