मीडिएटर का प्रारंभिक संबोधन (Opening Statement)
मीडिएटर का प्रारंभिक संबोधन (Opening Statement)
नमस्कार।
मेरा नाम संदीप कुमार दुबे है और मैं आज इस मामले में आपका मध्यस्थ (Mediator) हूँ।
सबसे पहले मैं आप सभी का धन्यवाद करता हूँ कि आपने अपने विवाद के समाधान के लिए मध्यस्थता जैसी सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण प्रक्रिया को चुना है। मध्यस्थता का उद्देश्य किसी को सही या गलत साबित करना नहीं है, बल्कि दोनों पक्षों को एक ऐसा समाधान खोजने में सहायता करना है जिसे वे स्वयं स्वीकार कर सकें।
मैं इस मामले में पूरी तरह तटस्थ, निष्पक्ष और स्वतंत्र हूँ। मेरा किसी भी पक्ष से कोई व्यक्तिगत या पेशेवर हित नहीं है। मेरा कार्य न तो निर्णय देना है और न ही किसी पक्ष का पक्ष लेना; मेरा कार्य केवल आपकी बातचीत को सुगम बनाना और समाधान तक पहुँचने में आपकी सहायता करना है।
मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मध्यस्थता पूरी तरह स्वैच्छिक प्रक्रिया है। यदि कोई समझौता होता है, तो वह केवल आपकी स्वतंत्र इच्छा और आपसी सहमति से होगा। कोई भी समझौता आप पर थोपा नहीं जाएगा।
मध्यस्थता की एक महत्वपूर्ण विशेषता गोपनीयता (Confidentiality) है। यहाँ जो भी बातें, तथ्य, सुझाव या प्रस्ताव रखे जाएंगे, वे गोपनीय रहेंगे और सामान्यतः न्यायालय में आपके विरुद्ध उपयोग नहीं किए जा सकते। इसलिए आप खुलकर अपनी बात रख सकते हैं।
यदि मुझे आवश्यकता महसूस होगी, तो मैं किसी एक पक्ष के साथ अलग से निजी बैठक (Private Session/Caucus) कर सकता हूँ। उस दौरान जो भी जानकारी कोई पक्ष मुझे बताएगा, उसे मैं उसकी स्पष्ट अनुमति के बिना दूसरे पक्ष के साथ साझा नहीं करूँगा। इससे प्रत्येक पक्ष को अपनी चिंताओं और अपेक्षाओं को खुलकर रखने का अवसर मिलता है।
मध्यस्थता को सफल बनाने के लिए मैं आप सभी से कुछ सहयोग की अपेक्षा करता हूँ—
कृपया अपने मोबाइल फोन साइलेंट या स्विच ऑफ रखें।
एक-दूसरे के प्रति सम्मानजनक व्यवहार बनाए रखें।
किसी भी प्रकार की अभद्र, अपमानजनक या उत्तेजक भाषा का प्रयोग न करें।
जो भी कहना हो, कृपया मुझे संबोधित करके कहें।
एक-दूसरे या एक-दूसरे के अधिवक्ताओं से सीधे बहस करने से बचें।
जब एक पक्ष बोल रहा हो, तो दूसरा पक्ष ध्यानपूर्वक सुने।
किसी की बात बीच में न काटें और न ही हस्तक्षेप करें।
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा।
मैं आप सभी से यह भी अनुरोध करता हूँ कि केवल अपनी कानूनी स्थिति ही नहीं, बल्कि अपनी वास्तविक चिंताओं, आवश्यकताओं और अपेक्षाओं पर भी चर्चा करें। कई बार विवाद का समाधान केवल कानूनी तर्कों से नहीं, बल्कि आपसी समझ और संवाद से निकलता है।
यदि आज कोई सहमति बनती है, तो उसे लिखित रूप में तैयार किया जाएगा। समझौते की सभी शर्तें आप स्वयं तय करेंगे और केवल वही शर्तें लिखी जाएँगी जो स्पष्ट, व्यावहारिक और कानूनी रूप से लागू करने योग्य हों।
अंत में, मैं आप सभी को आश्वस्त करना चाहता हूँ कि यह प्रक्रिया सहयोग, सम्मान और संवाद पर आधारित है। यदि हम धैर्यपूर्वक एक-दूसरे को सुनें और समाधान की भावना से आगे बढ़ें, तो अक्सर ऐसे रास्ते निकल आते हैं जो न्यायालयी निर्णय से भी अधिक संतोषजनक होते हैं।
क्या मध्यस्थता की प्रक्रिया, नियमों या मेरे दायित्वों के संबंध में किसी को कोई प्रश्न पूछना है?
यदि नहीं, तो हम कार्यवाही प्रारंभ करते हैं। धन्यवाद।
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