पत्रकारिता के इस दौर में गणेश शंकर विद्यार्थी को समझने की आवश्यकता,"कलम की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता के निकट होना नहीं, बल्कि सत्य के साथ खड़ा होना है।"



पत्रकारिता के इस दौर में गणेश शंकर विद्यार्थी को समझने की आवश्यकता,

— संदीप कुमार दुबे, 
भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल पत्रकार नहीं, बल्कि एक विचार, एक आंदोलन और एक नैतिक शक्ति के रूप में याद किए जाते हैं। गणेश शंकर विद्यार्थी ऐसा ही एक नाम है। आज जब पत्रकारिता की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व पर लगातार प्रश्न उठ रहे हैं, तब गणेश शंकर विद्यार्थी के जीवन और संघर्ष को समझना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।

25 मार्च 1931 को मात्र 41 वर्ष की आयु में उनका बलिदान हुआ, लेकिन उनका जीवन आज भी पत्रकारिता और सामाजिक नेतृत्व के लिए एक आदर्श बना हुआ है। उन्होंने अपने समाचार पत्र "प्रताप" के माध्यम से ब्रिटिश शासन के अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाई और साथ ही समाज में फैल रही सांप्रदायिकता, अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों का भी निर्भीकता से विरोध किया।

गणेश शंकर विद्यार्थी उन पत्रकारों में नहीं थे जो सत्ता के निकट रहकर सुविधाएं प्राप्त करें। वे उन पत्रकारों में थे जो जनता के बीच रहकर उनकी पीड़ा को अपनी कलम का विषय बनाते थे। उनकी लेखनी का उद्देश्य किसी दल, वर्ग या समुदाय का समर्थन करना नहीं, बल्कि सत्य और न्याय का पक्ष लेना था। यही कारण था कि वे अंग्रेजी हुकूमत के भी निशाने पर रहे और सांप्रदायिक ताकतों के भी।

सन 1919 से 1931 तक लगभग 18 वर्षों तक उन्होंने "प्रताप" का संपादन किया। इस दौरान "प्रताप" केवल एक समाचार पत्र नहीं रहा, बल्कि जनता की आवाज़ बन गया। किसानों, मजदूरों, गरीबों और शोषितों की समस्याओं को जिस निर्भीकता से प्रताप ने उठाया, उसने पत्रकारिता के उच्चतम मानक स्थापित किए।

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान के केवल तीन दिन बाद कानपुर सांप्रदायिक दंगों की आग में जल रहा था। उस समय गणेश शंकर विद्यार्थी सुरक्षित स्थान पर बैठकर लेख नहीं लिख रहे थे, बल्कि सड़कों पर उतरकर लोगों की जान बचा रहे थे। वे हिंदू मोहल्लों में जाकर मुसलमानों को बचाते थे और मुस्लिम बस्तियों में जाकर हिंदुओं की रक्षा करते थे। उनके लिए इंसान की पहचान उसका धर्म नहीं, उसकी मानवता थी।

इसी मानवता की रक्षा करते हुए दंगाइयों ने उन पर हमला कर दिया और वे शहीद हो गए। उनकी अंतिम यात्रा में हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के हजारों लोग शामिल हुए। उनका जीवन और बलिदान इस बात का प्रमाण है कि सच्चा पत्रकार केवल खबरें नहीं लिखता, बल्कि समाज को जोड़ने का कार्य भी करता है।

आज जब पत्रकारों को प्रश्न पूछने पर मुकदमों, बहिष्कार और दबावों का सामना करना पड़ता है, तब गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन हमें सिखाता है कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता की प्रशंसा नहीं, बल्कि सत्य की रक्षा करना है। सीमित संसाधनों, निरंतर संघर्ष और विरोध के बावजूद उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।

गणेश शंकर विद्यार्थी केवल अतीत के एक महान पत्रकार नहीं हैं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की पत्रकारिता के लिए एक जीवंत मार्गदर्शक हैं। यदि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बने रहना है, तो उसे गणेश शंकर विद्यार्थी के साहस, निष्पक्षता, संवेदनशीलता और सत्यनिष्ठा से प्रेरणा लेनी होगी।

 सत्य, न्याय, मानवता और सामाजिक सद्भाव के लिए उनकी तरह निर्भीक होकर खड़े रहेंगे।

"कलम की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता के निकट होना नहीं, बल्कि सत्य के साथ खड़ा होना है।"

— संदीप कुमार दुबे
एडवोकेट 
चेयरमैन, छठी मैया फाउंडेशन

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