माया बहुत ठगनी है— संदीप
माया बहुत ठगनी है
यह संसार जितना सुंदर दिखाई देता है, उतना सरल नहीं है।
यहाँ हर ओर माया का जाल फैला हुआ है।
मनुष्य जन्म लेते ही रिश्तों, इच्छाओं, धन, प्रतिष्ठा, शक्ति और अहंकार के ऐसे चक्र में फँस जाता है कि वह अपने जीवन का वास्तविक उद्देश्य ही भूल जाता है।
इसीलिए संतों और महापुरुषों ने बार-बार कहा है —
“माया बहुत ठगनी है।”
माया मनुष्य को कभी धन के पीछे दौड़ाती है, कभी झूठी प्रशंसा के पीछे, तो कभी ऐसे अहंकार में डाल देती है जहाँ उसे स्वयं के अलावा कोई दिखाई नहीं देता।
मनुष्य सोचता है कि अधिक धन, बड़ा घर, ऊँचा पद और प्रसिद्धि ही जीवन का सबसे बड़ा सुख है, लेकिन जब जीवन कठिन मोड़ पर पहुँचता है तब समझ आता है कि इन सबका वास्तविक मूल्य बहुत सीमित है।
आज का समाज भी इसी माया के प्रभाव में जी रहा है।
लोग एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में रिश्तों की गर्माहट खोते जा रहे हैं।
सत्य की जगह दिखावा बढ़ रहा है।
प्रेम की जगह स्वार्थ बढ़ रहा है।
मानवता की जगह अहंकार बढ़ रहा है।
यही माया का सबसे बड़ा छल है कि मनुष्य को गलत मार्ग पर ले जाकर भी उसे यह एहसास नहीं होने देती कि वह भटक चुका है।
माया इतनी शक्तिशाली है कि बड़े-बड़े ज्ञानी, तपस्वी और बलवान भी इसके मोह में पड़ जाते हैं।
कभी धन का अभिमान, कभी सुंदरता का गर्व, कभी सत्ता का नशा और कभी रिश्तों का मोह — यही माया के अनेक रूप हैं।
लेकिन भारतीय संस्कृति ने हमें इस माया से बाहर निकलने का मार्ग भी बताया है।
वह मार्ग है — भक्ति, संयम, सेवा और सत्य का मार्ग।
और इसी मार्ग का सबसे पवित्र उदाहरण है छठ महापर्व।
छठ केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मअनुशासन का महान पर्व है।
जब व्रती 36 घंटे का कठिन निर्जला व्रत रखते हैं, तब वे केवल धार्मिक परंपरा नहीं निभाते, बल्कि अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण करना सीखते हैं।
जब अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, तब यह संदेश दिया जाता है कि जीवन में केवल उगते सूरज का ही सम्मान नहीं होना चाहिए, बल्कि संघर्ष और कठिन समय का भी सम्मान होना चाहिए।
और जब उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, तब यह विश्वास जागता है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश अवश्य आएगा।
छठी मईया हमें सिखाती हैं कि सच्चा सुख भोग-विलास में नहीं, बल्कि सादगी में है।
सच्ची शक्ति क्रोध और अहंकार में नहीं, बल्कि धैर्य और करुणा में है।
सच्ची पूजा केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि माता-पिता की सेवा, समाज की भलाई और मानवता के सम्मान में है।
आज आवश्यकता है कि मनुष्य माया के इस छलावे को पहचाने।
धन कमाना गलत नहीं है, लेकिन धन के लिए मानवता खो देना गलत है।
सम्मान पाना गलत नहीं है, लेकिन सम्मान के लिए दूसरों को अपमानित करना गलत है।
जीवन में आगे बढ़ना आवश्यक है, लेकिन इतना आगे भी नहीं बढ़ जाना चाहिए कि अपने संस्कार और अपने लोग पीछे छूट जाएँ।
माया हमेशा मनुष्य को बाहरी चमक दिखाती है, जबकि सत्य भीतर की शांति में छिपा होता है।
जिस दिन मनुष्य यह समझ लेता है कि जीवन का सबसे बड़ा धन प्रेम, सेवा, संस्कार और आत्मिक शांति है, उसी दिन वह माया के सबसे बड़े जाल से मुक्त होने लगता है।
आइए, हम सभी छठी मईया से प्रार्थना करें कि वे हमारे मन से अहंकार, लालच और छल को दूर करें तथा हमें सत्य, प्रेम और मानवता के मार्ग पर चलने की शक्ति दें।
हम ऐसा समाज बनाएँ जहाँ दिखावे से अधिक संस्कार का सम्मान हो, स्वार्थ से अधिक सेवा का महत्व हो और माया से अधिक मानवता की जीत हो।
छठी मईया की कृपा सभी पर बनी रहे।
जय छठी मईया।
— संदीप कुमार दुबे
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