सतत विद्युत प्रणाली का भविष्य”

वक्ता : संदीप कुमार दुबे
अधिवक्ता एवं मध्यस्थ, सर्वोच्च न्यायालय, भारत
आदरणीय मुख्य अतिथि,
सम्मानित विशिष्ट अतिथिगण,
माननीय वक्तागण,
और इस गरिमामयी संगोष्ठी में उपस्थित सभी महानुभावों को मेरा सादर प्रणाम।
आज “सतत विद्युत प्रणाली का भविष्य” विषय पर विधिक दृष्टिकोण से अपने विचार प्रस्तुत करना मेरे लिए गर्व और सौभाग्य की बात है। मैं इस विषय को अपनी संस्कृति और आस्था से जोड़ते हुए विशेष रूप से छठ पर्व की भावना के साथ रखना चाहता हूँ, क्योंकि छठ पर्व प्रकृति, सूर्य, जल और ऊर्जा के प्रति भारतीय चेतना का जीवंत प्रतीक है।
छठ पर्व हमें सिखाता है कि
प्रकृति का उपयोग नहीं,
प्रकृति का सम्मान ही सच्चा विकास है।
आज जिसे हम आधुनिक भाषा में “सतत ऊर्जा” कहते हैं, उसे हमारी परंपरा ने हजारों वर्षों पहले छठ पर्व के माध्यम से जीवन में उतार दिया था। सूर्य को अर्घ्य देना केवल आस्था नहीं है, वह ऊर्जा के मूल स्रोत के प्रति कृतज्ञता और संतुलन का संदेश है।
साथियों,
सतत ऊर्जा केवल तकनीकी विषय नहीं है, यह हमारा संवैधानिक, विधिक और नैतिक कर्तव्य है।
हमारा संविधान कहता है –
अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण में जीवन का अधिकार है।
अनुच्छेद 48(क) राज्य को पर्यावरण संरक्षण का निर्देश देता है।
अनुच्छेद 51(क)(छ) प्रत्येक नागरिक को प्रकृति, जल, वायु, वन और जीव-जंतुओं की रक्षा का कर्तव्य सौंपता है।
छठ पर्व इन्हीं संवैधानिक मूल्यों का लोक रूप है।
जहाँ संविधान अधिकार और कर्तव्य देता है,
वहीं छठ पर्व हमें संस्कार और संवेदना देता है।
साथियों,
भारत में सतत ऊर्जा के लिए मजबूत विधिक ढाँचा मौजूद है।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम,
विद्युत अधिनियम,
भूमि अधिग्रहण कानून,
प्रदूषण नियंत्रण कानून,
और हरित अधिकरण जैसी संस्थाएँ –
ये सभी मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि
विकास हो, पर विनाश न हो।
ऊर्जा बने, पर पर्यावरण न टूटे।
पर समस्या कानूनों की कमी की नहीं है,
समस्या उनके प्रभावी और संवेदनशील क्रियान्वयन की है।
कानून तभी जीवित होता है,
जब वह धरातल पर न्याय बनकर उतरे।
भूमि अधिग्रहण के समय,
पर्यावरणीय स्वीकृति के समय,
और ऊर्जा परियोजनाओं के विकास के समय
यदि स्थानीय लोगों की आस्था, परंपरा और जीवनशैली की उपेक्षा हुई,
तो कोई भी परियोजना वास्तव में “सतत” नहीं कहलाएगी।
छठ पर्व हमें सिखाता है –
दबाव नहीं, समर्पण।
शोषण नहीं, संतुलन।
अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व।
यही भावना हमारे विधिक ढाँचे की आत्मा होनी चाहिए।
साथियों,
सतत ऊर्जा का अर्थ है –
प्रकृति से उतना ही लेना,
जितना हम उसे लौटा सकें।
सूर्य केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं,
जीवन का आधार है।
जल केवल संसाधन नहीं,
संस्कृति है।
वायु केवल तत्व नहीं,
प्राण है।
यदि हमारे कानून इस भाव को आत्मसात कर लें,
तो भारत दुनिया को सतत ऊर्जा का केवल तकनीकी नहीं,
आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मॉडल भी दे सकता है।
मैं पूरे विश्वास के साथ कहना चाहता हूँ –
“छठ पर्व हमारे संस्कारों में जो सिखाता है,
भारत का संविधान और कानून उसी को विधि में बदलते हैं।
संस्कार और संविधान जब साथ चलते हैं,
तभी सतत ऊर्जा का सच्चा भविष्य बनता है।”
अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि –
सतत विद्युत प्रणाली का भविष्य
केवल योजनाओं, नीतियों और परियोजनाओं से नहीं बनेगा,
वह बनेगा छठ जैसे पर्वों की भावना से,
जहाँ प्रकृति पूजा है
और संरक्षण संस्कार।
आइए, हम सब मिलकर ऐसा विधिक ढाँचा बनाएँ
जो आधुनिक विज्ञान और प्राचीन संस्कृति को जोड़ सके,
जो विकास और धर्म,
तकनीक और प्रकृति,
कानून और करुणा के बीच सेतु बने।
तभी भारत वास्तव में
सतत ऊर्जा का पथप्रदर्शक राष्ट्र बनेगा।
धन्यवाद।
छठी मैया की जय।
जय भारत।

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