“ईश्वर, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?”

ईश्वर : माँगने से पहले समर्पण की सीख
इंसान जब ईश्वर के सामने खड़ा होता है,
तो उसके होंठों पर सबसे पहले “माँग” आ जाती है।
हे ईश्वर, दुख दूर कर दो…
हे ईश्वर, संकट से बचा लो…
हे ईश्वर, सफलता दे दो…
हे ईश्वर, मेरी रक्षा करो…
पर ईश्वर के दर पर झुका हुआ इंसान
सिर्फ माँगने के लिए नहीं आया होता,
वह अनजाने में ही
अपने पूरे अस्तित्व को अर्पण करने आया होता है।
ईश्वर को भोग नहीं चाहिए,
उन्हें भाव चाहिए।
उन्हें दिखावा नहीं चाहिए,
उन्हें सच्चाई चाहिए।
उन्हें शब्दों की पूजा नहीं,
कर्मों की पवित्रता चाहिए।
जब कोई माँ
अपने बच्चे के लिए रात-रात भर जागती है,
तो वह ईश्वर की पूजा कर रही होती है।
जब कोई बेटा
अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बनता है,
तो वह ईश्वर के चरणों में सिर रख रहा होता है।
जब कोई इंसान
दूसरे के दर्द को अपना समझता है,
तो वहीं ईश्वर प्रकट हो जाते हैं।
ईश्वर कभी कुछ माँगते नहीं,
वह सिर्फ देते हैं।
सूरज की तरह,
जो बिना भेदभाव सबको उजाला देता है।
हवा की तरह,
जो बिना शर्त सबको जीवन देती है।
पानी की तरह,
जो सबकी प्यास बुझाता है।
ईश्वर हमें सिखाते हैं –
माँगने वाले नहीं,
देने वाले बनो।
जब हम किसी भूखे को रोटी देते हैं,
तो ईश्वर मुस्कराते हैं।
जब हम किसी रोते को हँसी देते हैं,
तो ईश्वर हमारे भीतर बस जाते हैं।
जब हम किसी टूटे हुए दिल को हिम्मत देते हैं,
तो ईश्वर हमें अपने आँचल में समेट लेते हैं।
ईश्वर मंदिर में नहीं,
पहले इंसान के दिल में बसते हैं।
ईश्वर मूर्ति में नहीं,
हमारे चरित्र में प्रकट होते हैं।
ईश्वर आरती में नहीं,
हमारे आचरण में जीवित रहते हैं।
जिस दिन हम ईश्वर से यह पूछना छोड़ देंगे
कि “मुझे क्या मिलेगा?”
और यह पूछने लगेंगे
कि “ईश्वर, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?”
उस दिन हमारी पूजा
रिवाज़ नहीं,
जिम्मेदारी बन जाएगी।
तब हमारा हर आँसू प्रार्थना होगा,
हर त्याग तपस्या बनेगा,
हर सेवा पूजा बन जाएगी,
और हमारा पूरा जीवन
ईश्वर को समर्पित
एक जीवंत आराधना बन जाएगा।

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