कर्म की सार्थकता : उपलब्धि नहीं, उत्तरदायित्व


कर्म की सार्थकता : उपलब्धि नहीं, उत्तरदायित्व
— संदीप कुमार दुबे
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय | चेयरमैन, छठी मइया फ़ाउंडेशन
आज के समय में मनुष्य की सफलता को अक्सर पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से मापा जाता है। समाज ने उपलब्धि की परिभाषा को इतना संकुचित कर दिया है कि कर्म का वास्तविक उद्देश्य कहीं पीछे छूटता जा रहा है। जबकि सत्य यह है कि मनुष्य अपने कर्मों से केवल सफलता नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष और सामाजिक उत्तरदायित्व की पूर्ति चाहता है।
कर्म का मूल्य उसकी चमक में नहीं, उसके प्रभाव में होता है। यदि किसी व्यक्ति के कार्य से किसी का जीवन आसान हुआ, किसी को न्याय मिला, किसी परिवार में फिर से विश्वास लौटा या समाज में सकारात्मक परिवर्तन आया—तो वही सच्ची उपलब्धि है। यह उपलब्धि न तो मंच की मोहताज होती है, न ही प्रशंसा की।
आज आवश्यकता है कि हम कर्म को प्रतिस्पर्धा नहीं, सेवा के रूप में देखें। जब कर्म स्वार्थ से मुक्त होकर समाज के लिए समर्पित होता है, तब वह व्यक्ति को भी ऊँचा उठाता है और समाज को भी सशक्त बनाता है। ऐसे कर्म ही आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनते हैं।
एक अधिवक्ता के रूप में मैंने अनुभव किया है कि न्याय केवल अदालतों में नहीं मिलता, वह संवेदनशीलता, संवाद और समाधान में भी बसता है। जब कानून मानवता से जुड़ता है, तभी वह सच्चे अर्थों में न्याय बनता है। यही सोच जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने कार्यों से यह प्रश्न पूछें—
क्या मेरा कर्म समाज को जोड़ रहा है या तोड़ रहा है?
क्या मैं केवल अपना भविष्य गढ़ रहा हूँ या आने वाली पीढ़ी का भी?
यदि उत्तर सकारात्मक है, तो समझिए वही आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
अंततः व्यक्ति अपने कर्मों से यही चाहता है कि उसके जाने के बाद लोग कहें—
“उसने केवल जीवन नहीं जिया, उसने जीवन को दिशा दी।”

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