यह वर्ष नए संकल्पों का है
अधिवक्ता – सर्वोच्च न्यायालय
चेयरमैन – छठी मइया फ़ाउंडेशन
नया वर्ष केवल कैलेंडर का पन्ना बदलने का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और आत्मनिर्माण का अवसर होता है। यह वह समय है जब मनुष्य अपने अतीत से सीख लेकर भविष्य की दिशा तय करता है। यह वर्ष हम सभी के लिए नए संकल्पों, नई ऊर्जा और नई चेतना का प्रतीक बने—यही कामना है।
आज का युग केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व का युग है। समाज, संस्कृति और संस्कार—तीनों को साथ लेकर चलना ही सच्ची प्रगति है। जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों को समझता है, तभी राष्ट्र मजबूत होता है। यही भावना छठी मइया की परंपरा भी सिखाती है—त्याग, तप, अनुशासन और लोककल्याण।
नए संकल्पों का अर्थ केवल लक्ष्य निर्धारित करना नहीं, बल्कि उन्हें सत्य, संयम और संवेदना के साथ निभाना है। हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम अपने आचरण से समाज को दिशा देंगे, न कि केवल उपदेशों से। आज आवश्यकता है नैतिक नेतृत्व की, पारदर्शिता की और सेवा-भाव से प्रेरित कर्मयोग की।
एक अधिवक्ता के रूप में मेरा विश्वास है कि न्याय केवल न्यायालयों की सीमाओं में नहीं बंधा होता। न्याय तब सजीव होता है जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। और एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में मेरा अनुभव है कि जब जनभागीदारी जुड़ती है, तब परिवर्तन अवश्य होता है।
यह वर्ष आत्मबल, सकारात्मक सोच और सामाजिक समर्पण का वर्ष बने। हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा से करेंगे और एक न्यायपूर्ण, संवेदनशील तथा सशक्त भारत के निर्माण में अपना योगदान देंगे।
यही नववर्ष का सच्चा संकल्प है।
— संदीप दुबे
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय
चेयरमैन, छठी मइया फ़ाउंडेशन
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