ऐसे थे हमारे अटल बिहारी वाजपेयी जी
ऐसे थे हमारे अटल जी
101वीं जयंती पर स्मरण
भारत की राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल सत्ता का संचालन नहीं करते, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को दिशा देते हैं। Atal Bihari Vajpayee ऐसे ही युगपुरुष थे—जिन्होंने राजनीति को शालीनता, विचार को संतुलन और नेतृत्व को करुणा से जोड़ा।
अटल जी के व्यक्तित्व में वह आत्मीयता थी, जिसने उन्हें हर प्रांत, हर समाज और हर वर्ग का अपना बना दिया। जनता ने उनमें केवल एक प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि भरोसे, संवेदना और नैतिक नेतृत्व का प्रतीक देखा। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि सत्ता में रहते हुए भी विनम्रता और मानवीयता को सर्वोच्च स्थान दिया जा सकता है।
अटल जी के लिए राजनीति संघर्ष का अखाड़ा नहीं, संवाद की साधना थी। उनकी वाणी में कठोरता नहीं, स्पष्टता थी; उनके विचारों में कटुता नहीं, बल्कि दृढ़ता थी। संसद में उनके शब्द लोकतांत्रिक मर्यादा के मानक बनते थे। वे असहमति को शत्रुता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की अनिवार्य शक्ति मानते थे।
उनकी कविताएँ केवल साहित्य नहीं थीं—वे राष्ट्र के अंतर्मन की अभिव्यक्ति थीं।
“हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा”
यह पंक्ति केवल काव्य नहीं, बल्कि उनके जीवन-दर्शन और नेतृत्व-संकल्प का उद्घोष थी।
अटल जी का दृष्टिकोण विकास को लेकर अत्यंत स्पष्ट था। वे विकास को अनुदान नहीं, बल्कि नागरिकों का अधिकार मानते थे। संपर्क, शिक्षा, विज्ञान और आधारभूत संरचना—इन सभी को उन्होंने राष्ट्रीय आत्मसम्मान और सामाजिक प्रगति से जोड़ा।
उनका राष्ट्रवाद उदार, मानवीय और उत्तरदायी था—ऐसा राष्ट्रवाद जो शक्ति के साथ संयम रखता है और सामर्थ्य के साथ शांति का संदेश देता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को एक जिम्मेदार, परिपक्व और शांतिप्रिय राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में उनका योगदान ऐतिहासिक और अविस्मरणीय है।
लोकतंत्र की परिपक्वता तब दिखाई देती है, जब विरोधी भी नेतृत्व का सम्मान करें। अटल जी इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरे। सत्ता में हों या विपक्ष में—उन्होंने सदैव गरिमा, मर्यादा और संवाद की परंपरा का पालन किया। इसी कारण वे दलों से ऊपर उठकर राष्ट्र के नेता बने।
आज उनकी 101वीं जयंती केवल स्मरण का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। जब राजनीति शोर में बदलती प्रतीत हो, अटल जी का जीवन संयम का पाठ पढ़ाता है। जब सत्ता अहंकार का रूप ले, अटल जी विनम्रता का स्मरण कराते हैं। और जब विचार संकुचित हों, अटल जी समावेश और संवाद का मार्ग दिखाते हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी जी आज भी हमारे बीच हैं—अपने विचारों में, अपने शब्दों में और अपने आदर्शों में।
ऐसे थे हमारे अटल जी।
और ऐसे ही वे सदैव स्मरण किए जाते रहेंगे।
लेखक:
संदीप कुमार दुबे
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय, भारत
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