हम ईश्वर को पाना नहीं चाहते, हम ईश्वर से पाना चाहते हैं

 
हम ईश्वर को पाना नहीं चाहते, हम ईश्वर से पाना चाहते हैं
मनुष्य सृष्टि का सबसे जागरूक प्राणी है। उसके भीतर ज्ञान की जिज्ञासा है, सत्य की खोज है, परंतु उसी के साथ एक गहरी चाह भी है — पाने की, भोगने की, संग्रह करने की।
जब यही प्रवृत्ति धर्म और भक्ति के क्षेत्र में आती है, तो वह बन जाती है — “ईश्वर से पाने की चाह”।
ईश्वर — साधन नहीं, साध्य हैं
आज अधिकांश लोग मंदिर जाते हैं, व्रत रखते हैं, दान करते हैं, पूजा करते हैं — लेकिन उनका उद्देश्य प्रायः होता है कुछ प्राप्त करना।
कोई स्वास्थ्य मांगता है, कोई सफलता, कोई संतान, कोई समृद्धि, कोई शांति।
कम ही लोग ऐसे हैं जो कहते हैं —
“हे प्रभु! मैं तुझे चाहता हूँ, तुझसे कुछ नहीं।”
यही अंतर है ‘ईश्वर से पाने’ और ‘ईश्वर को पाने’ में।
पहला है भौतिक मनुष्य का मार्ग, दूसरा है आत्मा का मार्ग।
🌿 पाने की लालसा बनाम मिलने की अनुभूति
जब हम ईश्वर से कुछ पाने की सोचते हैं, तब हमारा संबंध व्यवहारिक होता है।
हम ईश्वर को दुकानदार बना देते हैं — जहाँ भक्ति, व्रत और पूजा के बदले में वरदान चाहते हैं।
परंतु जब हम ईश्वर को पाना चाहते हैं, तब भक्ति का रूप बदल जाता है।
वह व्यवहार से उठकर समर्पण में बदल जाती है।
ईश्वर से पाने की इच्छा “स्वार्थ” है,
ईश्वर को पाने की इच्छा “प्रेम” है।
 ईश्वर को पाना — आत्मा का जागरण
ईश्वर को पाना का अर्थ है — अपने भीतर छिपे दिव्य स्वरूप को पहचानना।
क्योंकि ईश्वर कहीं बाहर नहीं हैं, वे हमारे भीतर ही प्रकाशमान हैं।
जब मन शांत होता है, अहंकार मिटता है, वासनाएँ थमती हैं — तब भीतर का वह दिव्य प्रकाश झलकने लगता है।
वह क्षण ईश्वर-प्राप्ति का होता है, न कि किसी वरदान के मिलने का।
हम सब जीवन में किसी न किसी रूप में ईश्वर के निकट जाना चाहते हैं।
पर सच्चा मार्ग यह नहीं कि हम उनसे माँगें 
बल्कि यह कि हम उन्हें अनुभव करें, उन्हें जीएँ, और उनमें विलीन हो जाएँ।
“जब हम ईश्वर से कुछ नहीं माँगते,
तब ईश्वर स्वयं हमें सब कुछ दे देते हैं।”

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