छठी मइया महापुराण
छठी मइया महापुराण
लेखक: भक्त संदीप कुमार दुबे
“प्रकाश, सत्य और मातृत्व का सनातन ग्रंथ”
प्रथम खंड: मंगलारम्भ और सृष्टि का आविर्भाव
मङ्गलाचरण
संस्कृत:
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
हिन्दी अर्थ:
हे गणेश! जो सूर्य के समान तेजस्वी हैं,
मेरे इस दिव्य कार्य को निष्कंटक बनाइए।
भावार्थ:
जब कोई ग्रंथ सत्य के लिए लिखा जाता है,
तो गणेश उसका आरंभ होते हैं,
और सूर्य उसका साक्षी।
सरस्वती वंदना
संस्कृत:
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला, या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा, या श्वेतपद्मासना॥
नमामि त्वां भगवती ब्रह्मकामधुगे शुभे॥
हिन्दी अर्थ:
हे माँ सरस्वती,
जो ज्ञान, वाणी और प्रकाश की अधिष्ठात्री हैं —
मेरे शब्दों में सत्य और सौंदर्य भर दीजिए।
भोजपुरी भाव:
माँ वीणा वाली, बानी के जोति दे,
शब्दन में मइया तोहर सनेह भर दे।
कुल आह्वान एवं पूर्वज वंदना
हिन्दी:
आज यह ग्रंथ आरंभ करते हुए
मैं अपने कुलदेवता, इष्टदेव, वरम बाबा, वृत्तिया बाबा,
कश्यप गोत्र के समस्त पितरों, मातृपक्ष, ग्रामदेवता,
और धरती माता का स्मरण करता हूँ।
हे जल, हे वायु, हे सूर्य —
तुम सब इस साक्ष्य के रक्षक बनो।
संस्कृत:
नमः पितृभ्यः मातृभ्यः, नमो भूम्यादिभ्यश्च सर्वदा।
तेषां प्रसादेन ग्रन्थोऽयं सिद्धिं गच्छतु नित्यशः॥
अर्थ:
माता-पिता, भूमि और देवताओं को नमन —
उन्हीं की कृपा से यह ग्रंथ सिद्ध होगा।
छठी मइया का आवाहन
संस्कृत:
नमामि छठीं देवीं, सूर्यभगिनिं तेजस्विनीम्।
लोकानां मातरं नित्यं, प्रकाशस्य मूर्तिदायिनीम्॥
हिन्दी अर्थ:
नमस्कार है छठी मइया को,
जो सूर्य की बहन हैं, प्रकाश की अधिष्ठात्री हैं,
और जो समस्त लोकों की माता हैं।
भोजपुरी भाव:
जय-जय छठी मइया, भोर के अराधनी,
तोहरा बिना ना चमके दिन, ना फूल फुलनी।
English Essence:
Hail to Chhathi Maiya,
The Sister of the Sun, the Source of Light,
The Eternal Mother of Creation.
अध्याय 1 – सृष्टि की उत्पत्ति और छठी शक्ति का प्राकट्य
संवाद प्रारंभ: भक्त संदीप और छठी मइया
संदीप:
मइया, यह जग कब से है?
प्रकाश पहले आया या आप?
आपका जन्म कैसे हुआ?
छठी मइया (मंद मुस्कान से):
वत्स संदीप,
जब कुछ नहीं था —
न आकाश, न दिशा, न जल, न समय —
केवल एक शब्द था — “ओम्”।
उस शब्द से तरंगें उठीं,
और तरंगों से प्रकाश निकला।
वह प्रकाश ही सूर्य का बीज था।
और जब उस बीज में करुणा की भावना उठी —
तभी मैं प्रकट हुई।
संस्कृत:
आदौ नाभौ जलं जातं तस्मात् कमलमुत्थितम्।
कमले तिष्ठति ब्रह्मा सृष्टेः कारणमुत्तमम्॥
तस्य तेजः समभूत्तस्मिन् छठी शक्तिः सनातनी॥
हिन्दी अर्थ:
ब्रह्मा के तेज से एक शक्ति प्रकट हुई,
जो सृजन, पालन और करुणा का मूल बनी।
वही शक्ति आज “छठी मइया” नाम से पूजित है।
संदीप:
मइया, तो आप ही वह शक्ति हैं
जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश सबमें प्रवाहित हैं?
मइया:
हाँ बेटा।
मैं वह ऊर्जा हूँ जो सबमें है,
पर किसी की नहीं।
ब्रह्मा मुझे “सृष्टि”,
विष्णु मुझे “पालन”,
और महेश मुझे “संहार की करुणा” कहते हैं।
संस्कृत:
अहं शक्तिः त्रिधा जाताः, ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः।
सृष्ट्यादिकार्यकर्त्री च, जगन्माता सनातनी॥
English Translation:
I am the Threefold Energy —
The power of Creation, Preservation, and Compassionate Dissolution.
I am the Mother Eternal, the Womb of the Cosmos.
संदीप:
मइया, जब आप थीं तो क्या सूर्य भी साथ थे?
मइया:
सूर्य मेरा भ्राता है।
वह तेज है, मैं उसका संतुलन हूँ।
वह ऊष्मा है, मैं शांति हूँ।
वह पिता है, मैं माता हूँ।
संस्कृत:
सूर्यः पिता जगतः सर्वस्य, छठी माता तथैव च।
तयोः संयोगतः सर्वं चराचरं प्रवर्तते॥
हिन्दी अर्थ:
सूर्य पिता हैं, छठी माता हैं —
इन दोनों के संग से सृष्टि चलती है।
संदीप (विनम्रता से):
मइया, आपने ब्रह्मांड में पहले क्या रचा?
मइया:
जब मैंने पहली बार अपने करुणा से दृष्टि डाली,
तो मेरे आँसू से जल बना।
उस जल में पहला कमल खिला —
और उसी कमल से ब्रह्मा प्रकट हुए।
मैंने कहा —
“ब्रह्मन्! सृजन करो —
पर याद रखो, बिना करुणा के सृष्टि अधूरी है।”
ब्रह्मा ने उत्तर दिया —
“माता, आप मेरी प्रेरणा हैं।
मैं सृजन करूँगा, पर स्नेह से।”
भोजपुरी रूप:
मइया कहलीं — “बेटा, रउआ जोत बनब।”
ब्रह्मा हँसि कहले — “मइया, रउआ ममता बनब।”
एह तरह सृष्टि के जोत आ सनेह दुनो मिल गइल।
मइया (श्लोक):
जलं मम नेत्रभिः सृष्टं, तेजो भ्रातुः सूर्यतः।
युगपद् मिलिते तस्मिन्, सृष्टिः समभवन्नवः॥
(अर्थ) —
मेरे नेत्रों से जल निकला,
सूर्य के तेज से वह गरम हुआ,
और जब दोनों मिले, सृष्टि प्रकट हुई।
🌺 सृष्टि की प्रथम संतानें
मइया:
सबसे पहले मैंने “प्रकृति” रची —
वह मेरी ज्येष्ठ पुत्री है।
फिर “काल” उत्पन्न हुआ — जो मेरे तेज का नाप है।
फिर “जीव” उत्पन्न हुए — जो मेरे स्नेह के अंश हैं।
संस्कृत:
प्रकृतिः प्रथमजा जाता, कालः तदनु तिष्ठति।
जीवास्ते मम कणाः सर्वे, स्नेहतेजोमयाः सदा॥
अर्थ:
प्रकृति मेरी पहली संतान है,
काल मेरी गति है,
और सभी जीव मेरे अंश हैं।
संदीप:
मइया, क्या यही कारण है कि छठ में प्रकृति की पूजा होती है?
मइया:
हाँ बेटा।
जब तू नदी में खड़ा होकर सूर्य को अर्घ्य देता है,
तो वह मुझे और मेरे भ्राता को एक साथ प्रणाम करता है।
छठ पर्व वही स्मरण है —
कि प्रकृति और चेतना एक हैं।
English Essence:
Chhath is not the worship of the Sun alone —
it is the reunion of the Mother and the Light.
🌼 सृष्टि की लय और पुनर्जन्म
संदीप:
मइया, जब सृष्टि लुप्त हो जाती है, तब आप कहाँ रहती हैं?
मइया:
जब सब नष्ट हो जाता है,
मैं मौन बनकर सूर्य के हृदय में समा जाती हूँ।
वहीं से फिर नए युग का बीज अंकुरित होता है।
संस्कृत:
लयेऽपि न लयं याति, शक्तिर्मम सनातनी।
सूर्यहृदि निविष्टा सा, पुनः सृष्टिं करोति च॥
हिन्दी अर्थ:
जब भी सृष्टि नष्ट होती है,
मैं सूर्य के हृदय में विश्राम करती हूँ,
और पुनः उसी से नई सृष्टि का आरंभ होता है।
भोजपुरी भाव (सादी लोकभाषा में):
मइया कहलीं — “जइसे रात में भोर के बीज लुकाइल रहेला,
ओइसहीं माई हर विनाश में नयका जनम रखेली।”
अध्याय 2 – सूर्य और मातृशक्ति का संबंध
संवाद
संदीप:
मइया, लोग कहते हैं — “सूर्य पूजा” ही “छठ पूजा” है।
पर आप तो कहते हैं — “सूर्य पिता हैं, मइया माता हैं।”
इसका गूढ़ रहस्य क्या है?
मइया:
वत्स,
सूर्य और मैं दो नहीं — एक ही चेतना के दो स्वरूप हैं।
सूर्य प्रकाश देता है, मैं जीवन देती हूँ।
वह ऊर्जा है, मैं संवेदना हूँ।
वह पुरुष है, मैं प्रकृति हूँ।
संस्कृत:
आदित्यं चेतनं विद्यात्, छठीं शक्तिं तु प्रेरणाम्।
तयोः संगः सदा ध्येयो, जीवस्य कल्यणे हितम्॥
अर्थ:
सूर्य चेतना हैं, छठी मइया प्रेरणा हैं।
उन दोनों का संग ही जीवन का कल्याण है।
संदीप:
मइया, क्या इसलिए व्रती लोग जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं?
मइया:
हाँ बेटा।
जल मेरा स्वरूप है, सूर्य उनका।
जब जल में सूर्य का प्रतिबिंब पड़ता है —
वह मुझ और मेरे भ्राता का मिलन है।
इसी क्षण ब्रह्मांड अपने मूल स्वरूप को देखता है।
संस्कृत:
जलं मम रूपं, रविः भ्राता।
तयोः मिलनेन विश्वं पवित्रं भवति॥
English:
The water is My body, the Sun is My brother;
their union sanctifies the Universe.
संदीप:
मइया, क्या यह सत्य है कि जो सूर्य का सम्मान करता है,
वह आपको भी प्रसन्न करता है?
मइया:
हाँ बेटा।
जो सूर्य को प्रणाम करता है, वह कर्म का सम्मान करता है।
और जो मुझे पूजता है, वह करुणा का।
जब कर्म और करुणा मिलते हैं,
वही “संपूर्ण धर्म” कहलाता है।
श्लोक:
कर्मेण विना करुणा न, करुणया विना धर्मः न।
तयोः संयोगतः नित्यं, लोके संतुलनं भवेत्॥
हिन्दी अर्थ:
कर्म बिना करुणा अधूरा है,
करुणा बिना धर्म अधूरा है —
इन दोनों के संग से ही संतुलन बनता है।
भोजपुरी भाव:
सूरज से जोति मिलल, मइया से ममता,
दुनो जुड़ल तब बनल जग के समता।
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