अगर प्रेम सच्चा हो, तो उसमें स्वार्थ नहीं, केवल त्याग और सेवा का भाव होना चाहिए - मनोज तिवारी

 
“अगर प्रेम सच्चा हो, तो उसमें स्वार्थ नहीं, केवल त्याग और सेवा का भाव होना चाहिए।” -   मनोज तिवारी                                                                   
सतीश उपाध्याय जी ने मुस्कुराते हुए मंच से आग्रह किया—
“मनोज जी, आप भी रामकथा सुनाइए।”
✍️ संदीप कुमार दुबे
एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया
चेयरमैन, छठी मइया फ़ाउंडेशन
दिल्ली की रामलीला की रौनक
रात गहराने के साथ दिल्ली की रामलीला और भी निखर उठी। मंच पर रामकथा के भाव और संगीत बह रहे थे, पर असली आकर्षण उस भीड़ में था जहाँ मनोज तिवारी जी लोगों से सीधे मिल रहे थे। उनके साथ हर क्षण एक अलग ऊर्जा का अनुभव हो रहा था।
जब श्रीराम धार्मिक रामलीला समिति के चेयरमैन सतीश उपाध्याय जी ने मुस्कुराते हुए मंच से आग्रह किया—
“मनोज जी, आप भी रामकथा सुनाइए।”
इतना कहते ही पूरा पंडाल तालियों की गूंज से भर उठा।
मनोज तिवारी जी ने तुरंत आरंभ किया परशुराम संवाद
बिना किसी औपचारिक तैयारी के मनोज तिवारी जी ने सहजता से माइक थामा और परशुराम संवाद का गायन शुरू कर दिया। उनकी मीठी भोजपुरी वाणी और भावपूर्ण प्रस्तुति ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।
उन्होंने समझाया कि भगवान परशुराम का संदेश किसी जाति या वर्ग के संहार का नहीं, बल्कि अधर्म और अन्याय के विरुद्ध धर्म की स्थापना का था।
सत्य, करुणा और एकता से ही समाज में स्थायी शांति आ सकती है।
जैसे ही उनकी आवाज़ गूंजी, पूरा मैदान रामकथा के उस दिव्य प्रसंग में खो गया और जयकारों से गूंज उठा।
देर रात तक जनता के बीच – एक अविस्मरणीय अनुभव
मुझे भी उस रात उनके साथ रहने का अवसर मिला। रात 12:30 बजे तक श्री संजीव चौधरी जी भी उनके साथ सक्रिय रहे।
भीड़ में घूमते हुए हर उम्र और हर वर्ग के लोगों से मिलते समय मनोज तिवारी जी का उत्साह और सहजता अद्भुत थी।
उस रात मैंने नज़दीक से देखा कि मनोज तिवारी जी की—
भोजपुरी की मिठास और अपनापन,
हर किसी से आँखों में आँख डालकर संवाद करने की आदत,
राम और रामायण के आदर्शों को आधुनिक समाज से जोड़ने की क्षमता,
राजनीति से ऊपर उठकर लोक संस्कृति को जीवंत करने की लगन,
—इन सबने रामलीला को केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं रहने दिया; यह सामाजिक एकता और सांस्कृतिक गौरव का जीवंत पर्व बन गया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की योजना मनोज तिवारी जी का संवाद
रामायण के आदर्श आज भी प्रेरणा देते हैं। इसी भाव को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की अनेक योजनाओं में देखा जा सकता है—
मनोज तिवारी जी ने अपने संवाद में विशेष रूप से बताया कि—
स्वच्छ भारत, डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत—समाज के हर वर्ग को आगे बढ़ाने का निस्वार्थ प्रयास है।
जन–धन योजना, आयुष्मान भारत—वंचितों को साथ लेकर चलने की भावना को साकार करती हैं।
काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या राम मंदिर—भारतीय आस्था को वैश्विक पहचान देने वाले प्रकल्प हैं।
मनोज तिवारी जी ने कहा कि ये पहल हमें याद दिलाती हैं कि राष्ट्र-निर्माण के लिए त्याग और सेवा की भावना ही सबसे बड़ी शक्ति है।
राम–भरत संवाद की सीख : मनोज तिवारी जी का दृष्टिकोण
रामायण का एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग राम–भरत संवाद है, जहाँ भरत अपने अधिकारों का त्याग कर निस्वार्थ भाव से राम के आदर्शों को स्वीकारते हैं।
मनोज तिवारी जी ने अपने रामकथा संवाद में समझाया कि—
“अगर प्रेम सच्चा हो, तो उसमें स्वार्थ नहीं, केवल त्याग और सेवा का भाव होना चाहिए।”
यही संदेश आज भी हमारे समाज और नेतृत्व दोनों के लिए पथप्रदर्शक है।
रात के सन्नाटे में भीड़ के बीच मनोज तिवारी जी की जीवंत उपस्थिति, श्री सतीश उपाध्याय जी का “रामकथा सुनाइए” वाला आमंत्रण, मनोज तिवारी जी का तत्काल परशुराम संवाद से कथा शुरू करना, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की निस्वार्थ योजनाओं का आदर्श और मनोज तिवारी जी द्वारा प्रस्तुत राम–भरत संवाद का त्याग—ये सब हमें एक ही दिशा में ले जाते हैं:
एकता, सेवा और निस्वार्थ प्रेम से ही समाज और राष्ट्र का वास्तविक निर्माण सम्भव है।
(यह लेख संदीप कुमार दुबे, एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया एवं चेयरमैन, छठी मइया फ़ाउंडेशन द्वारा लिखा गया है।)

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