“रामलीला केवल परंपरा नहीं, समाज निर्माण का साधन है – सतीश उपाध्याय”

“रामलीला केवल परंपरा नहीं, समाज निर्माण का साधन है – सतीश उपाध्याय”
लेखक – संदीप कुमार दुबे
एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया
चेयरमैन, छठी मैया फाउंडेशन
✨ सतीश उपाध्याय जी का सांस्कृतिक नेतृत्व
भारतीय संस्कृति की धरोहर को जीवित रखना और उसे नई पीढ़ियों तक पहुँचाना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस दिशा में श्री सतीश उपाध्याय जी (विधायक एवं संरक्षक श्रीराम धार्मिक रामलीला समिति) का योगदान उल्लेखनीय है। वे राजनीति के साथ-साथ संस्कृति और समाज को जोड़ने वाले एक सशक्त व्यक्तित्व हैं।
सतीश उपाध्याय जी मानते हैं:
“रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह समाज को धर्म, संस्कृति और आदर्श जीवन की शिक्षा देने का माध्यम है। हमारा प्रयास है कि रामलीला के मंचन से नई पीढ़ी में संस्कार और सामाजिक एकता की भावना विकसित हो।”
उनका यह कथन दर्शाता है कि वे रामलीला को केवल कथा या मंचन तक सीमित नहीं, बल्कि समाज निर्माण की प्रक्रिया मानते हैं।
🌸 समाज को जोड़ने वाली धारा
उनके नेतृत्व में श्रीराम धार्मिक रामलीला समिति ने रामलीला के मंचन को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। मंचन की भव्यता के साथ उसमें अनुशासन, संस्कार और समाज को जोड़ने की शक्ति भी शामिल होती है। दिल्ली में आयोजित राम जन्मोत्सव की झांकी इसका जीवंत उदाहरण रही, जिसने दर्शकों को भक्ति और उत्साह से भर दिया।
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सतीश उपाध्याय जी राजनीति और समाज सेवा के साथ-साथ संस्कृति के भी सच्चे प्रहरी हैं। वे मानते हैं कि समाज का उत्थान तभी संभव है जब धर्म और संस्कृति की जड़ें मजबूत हों। इसी सोच के साथ वे लगातार प्रयासरत हैं कि रामलीला के माध्यम से भक्ति, नैतिकता और एकता का संदेश जन-जन तक पहुँचे।
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रामलीला केवल परंपरा नहीं है, बल्कि यह समाज को जोड़ने और राष्ट्र निर्माण का सशक्त साधन है। श्री सतीश उपाध्याय जी का नेतृत्व और दृष्टिकोण इस बात का प्रमाण है कि संस्कृति ही समाज की आत्मा है और उसका संरक्षण ही हमारी असली शक्ति है।
सतीश उपाध्याय जी वास्तव में संस्कृति और समाज दोनों के प्रेरणास्रोत हैं।
 

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