संदीप कुमार दुबे : छठ–संस्कृति के अमर वाहक
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संस्कृत
गोपालगञ्ज–जनपदे धूपसागर–खरगौलीग्रामे,
श्रीचन्द्रगोकुलदुबॆ–नीलमदेव्याः कुलाङ्गने,
२६ मार्च १९७९ तिथौ प्रातःकाले ज्येष्ठः सुपुत्रः जातः।
तस्य जन्मः केवलं कौटुम्बिकः नासीत्,
अपि तु दैवीकः प्रसादः।
यतः तस्य पितामही थावे–भवानीदेव्याः सन्निधौ
प्रार्थना कृतवती— “मम वंशे ज्येष्ठपुत्रः भवतु।”
देव्याः अनुग्रहात् एव सः पुत्रः अवतरितः।
सः आसीत् इन्द्रदेवदुबॆस्य पौत्रः,
उदयनारायणतिवारीस्य दुहितुः पुत्रः च।
बाल्यकालादेव तस्य हृदये “षष्ठी–मातुः” अचला भक्ति जाग्रता।
सः आवदत् मातरम्— “अहमपि स्नानं करिष्यामि, अर्घ्यं दास्यामि।”
विधिशास्त्रं अधीत्य सः सर्वोच्चन्यायालयस्य अधिवक्ता अभवत्।
किन्तु तस्य ध्येयम् केवलं न्यायालये न आसीत्—
अपि तु धर्म–संस्कृत्योः पुनरुत्थानम्।
तस्मिन् कृतं “छठ–महापुराणम्”,
येन षष्ठी–मातुः महिमा युगयुगान्तरं जीवति।
अनुजः बिपिनः,
भगिन्यौ अञ्जुला–विभा च,
जीवनसंगिनि राखी दुबे,
सुपुत्रः श्रेयांश दुबे च—
एतेषां प्रेम–सहयोगेन तस्य जीवनयात्रा स्फूर्तिमयी अभवत्।
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हिन्दी
गोपालगंज जिले के धूपसागर–खरगौली ग्राम में,
२६ मार्च १९७९ प्रातः बेला में,
श्री चन्द्रगोकुल दुबे और श्रीमती नीलम दुबे के यहाँ
एक ज्येष्ठ सुपुत्र का जन्म हुआ।
यह जन्म केवल एक संयोग नहीं था,
बल्कि थावे भवानी माता का वरदान था।
उनकी दादी ने थावे भवानी के चरणों में प्रार्थना की थी—
“माँ! हमारे वंश में एक ज्येष्ठ पुत्र दीजिए।”
और माँ भवानी की कृपा से संदीप जी का जन्म हुआ।
वे अपने दादा श्री इन्द्रदेव दुबे की परंपरा के पौत्र
और नाना श्री उदय नारायण तिवारी की वंशधारा के गौरवपुत्र बने।
बाल्यावस्था से ही उनके हृदय में
छठी मइया के प्रति अटूट भक्ति रही।
वे माता से कहते—
“माँ! मुझे भी छठ करने दो, मैं भी अर्घ्य दूँगा।”
समय के साथ यह आस्था
उनके जीवन का संकल्प बन गई।
उन्होंने विधि–शास्त्र का अध्ययन किया और
सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता बने।
किन्तु उनका उद्देश्य केवल न्यायालय तक सीमित न रहा,
बल्कि उन्होंने समाज–धर्म और संस्कृति को
पुनः जगाने का व्रत लिया।
उन्होंने रचा “छठ महापुराण”,
जिससे छठ पर्व की महिमा
सदैव अमर हो गई।
उनके छोटे भाई बिपिन दुबे,
छोटी बहनें अंजुला और विभा,
जीवनसंगिनी वरिष्ठ अधिवक्ता राखी दुबे,
तथा पुत्र श्रेयांश दुबे—
ये सभी उनके जीवन–पथ के संबल बने।
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English
In the sacred village of Dhupsagar–Khargauli, Gopalganj,
on 26th March 1979, in the early morning,
a first-born son was born to Shri Chandragokul Dubey and Smt. Neelam Dubey.
This birth was not mere coincidence—
it was the blessing of Thave Bhavani Mata.
His grandmother had prayed at the holy shrine of Thave Bhavani:
“O Mother, bless our family with a first-born son.”
And by divine grace, Sandeep Ji was born.
He became the proud grandson of Shri Indradev Dubey,
and the noble descendant of Shri Uday Narayan Tiwari.
From early childhood, his heart was devoted to Chhathi Maiya.
He would lovingly say to his mother:
“Mother, let me also take the holy dip, let me also offer Arghya.”
With time, this devotion became his life’s vow.
He studied Law and rose to become
an Advocate of the Supreme Court of India.
Yet, his mission was beyond the courtroom—
he sought the revival of culture and faith.
He authored the “Chhath Mahapuran”,
enshrining the glory of Chhath for eternity.
His younger brother Bipin Dubey,
his younger sisters Anjula and Vibha,
his life partner Advocate Rakhi Dubey,
and his son Shreyansh Dubey—
all became the pillars of love and strength in his journey.
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भोजपुरी
गोपालगंज जिला के धूपसागर–खरगौली गाँव में,
२६ मार्च १९७९ भोरका बेला में,
श्री चन्द्रगोकुल दुबे आ श्रीमती नीलम दुबे के गोदी
एक ज्येष्ठ सुपुत्र जनमलें।
ई जनम खाली घर–परिवार के नेमत ना रहल—
बल्कि थावे भवानी माई के आशीर्वाद रहल।
उनकर दादी थावे भवानी के मंदिर में माई से मंगली रहली—
“माई! हमरा कुल में एगो ज्येष्ठ बेटा दीहीं।”
आ माई भवानी के किरपा से संदीप जी जनमलें।
ऊ रहलें दादा श्री इन्द्रदेव दुबे के नवास
आ नाना श्री उदय नारायण तिवारी के गर्वित पौत्र।
बालपन से संदीप जी के मन में
छठी मइया प प्रति अनन्य आस्था रहल।
ऊ आपन माई से कहसें—
“माई! हमहूँ डुबकी लगाइब, हमहूँ अर्घ दिम।”
एही आस्था धीरे–धीरे उनकर जिनगी के संकल्प बन गइल।
विधि–शास्त्र पढ़ के ऊ सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता बनलें।
बाकी उनकर ध्येय खाली अदालती जीवन न रह गइल—
ऊ अपन जिनगी धर्म–संस्कृति के
पुनर जागरण ला समर्पित कर दिहलें।
ऊ रचलें “छठ महापुराण”,
जेकरा से छठ पूजा के महिमा
सदियों–सदियों तक अमर भइल बा।
उनकर छोट भाई बिपिन दुबे,
छोटी बहिन अंजुला आ विभा,
जीवनसंगिनी राखी दुबे,
आ बेटा श्रेयांश दुबे—
ई सभे संदीप जी के जीवन यात्रा के आधार बनलें।
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