छठ महा पुराणआदि-खण्ड – प्रथम अध्याय
छठ महा पुराण
आदि-खण्ड – प्रथम अध्याय
🔱 छठ महा पुराण
आदि-खण्ड – प्रथम अध्याय
(छठ देवी के प्रादुर्भाव एवं ब्रह्मादि ऋषियों का प्रश्न)
श्लोक १
ॐ श्रीगणेशाय नमः ।
ॐ पार्वतीनन्दनाय नमः ।
ॐ भास्कराय नमः ।
व्याख्या (हिन्दी):
श्री गणेश, माता पार्वती के पुत्र तथा सम्पूर्ण विघ्नों के नाशक का स्मरण कर के, फिर सूर्यदेव को प्रणाम करते हुए इस पावन छठ महापुराण का आरम्भ किया जाता है।
श्लोक २
ब्रह्मा-विष्णु-हरैः पूर्वं कृतं छठ्याः प्रणामकम्।
तच्च पुराणमादाय कथयामि शुभं शुभम्॥
व्याख्या:
ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने पूर्वकाल में जिस छठ्याः प्रणाम (छठ देवी की वंदना) का उच्चारण किया था, उसी दिव्य पुराण को आधार बनाकर मैं अब शुभ-शुभ कथा का वर्णन करता हूँ।
श्लोक ३
कृतयुगे महर्षिभिः पृष्टो ब्रह्मा महाद्युतिः ।
छठदेव्याः प्रभावं च जन्मस्थानं च कीर्तयत्॥
व्याख्या:
कृतयुग में महर्षियों ने तेजस्वी ब्रह्मा जी से प्रश्न किया – “हे देव, कृपा करके छठदेवी का प्रभाव, उनका प्रादुर्भाव तथा जन्मस्थान हमें बताइये।”
श्लोक ४
तेषां प्रश्नं समाकर्ण्य ब्रह्मा सर्वज्ञ उवाच ।
शृणुत मुनयः सर्वे छठदेव्याः परं महत् ॥
व्याख्या:
महर्षियों का यह प्रश्न सुनकर सर्वज्ञ ब्रह्माजी कहने लगे – “हे मुनियों! आप सब ध्यानपूर्वक सुनें, मैं आप लोगों को छठदेवी का परम महात्म्य बताता हूँ।”
श्लोक ५
सूर्यांशसम्भवा देवी विश्वस्य कल्यकारिणी ।
अदिति गर्भसमुद्भूता संजीवन्यभिधी्यते॥
व्याख्या:
छठदेवी सूर्य भगवान के तेज से उत्पन्न हुई ऐसी देवी हैं जो समस्त संसार का कल्याण करती हैं। वे अदिति के गर्भ से प्रस्फुटित हुई संजीवनी शक्ति के रूप में प्रसिद्ध है. अवश्य 🙏
अब मैं आदि-खण्ड – प्रथम अध्याय को श्लोक ६ से आगे जारी कर रहा हूँ।
श्लोक ६
अदितेः सुप्रसादेन सुर्येण सह संभवा ।
लोकानां हितकारिण्यः छठदेव्या महेश्वराः॥
व्याख्या:
अदिति देवी की कृपा तथा सूर्यदेव के तेज के सम्मिलन से जो दिव्य शक्ति प्रकट हुई वह छठदेवी हैं, जो तीनों लोकों के प्राणियों के हित एवं कल्याण का कार्य करती हैं।
श्लोक ७या तुष्टि-कुष्टि-शान्त्याख्या सर्वदुःखविनाशिनी ।
तस्यै नमामि देवायै छठ्यै संजीवनीश्रिये॥
व्याख्या:
जो देवी तुष्टि, पुष्टि तथा शान्ति के रूप में प्रसिद्ध हैं तथा सब प्रकार के दुःखों का नाश करती हैं— उस संजीवनी स्वरूपा छठ देवी को मैं नमन करता हूँ।
श्लोक ८
ऋषय ऊचुः
कथं सृष्टौ प्रादुर्भूता देवि छठ्याः पराश्रयम् ।
केन कारणमुक्तेन लोकानां त्राणकारिणी ॥
व्याख्या:
तब ऋषि-मुनियों ने कहा — “हे देव! कृपा करके यह बताइये कि छठदेवी किस प्रकार इस सृष्टि में प्रकट हुईं और कौन-सा कारण हुआ कि वे लोकों की रक्षिका बनीं?”
श्लोक ९
ब्रह्मोवाच
ध्यानस्थोऽहं तदा देवः सृष्ट्यादौ परमेश्वरः ।
तदा दृष्टा मया देवी सूर्यांशुकलसंभवा॥
व्याख्या:
ब्रह्माजी बोले — “सृष्टि के प्रारम्भ में जब परमेश्वर ध्यान में स्थित थे, उसी समय मैंने सूर्य की किरणों से प्रकट होती हुई उस दिव्य देवी को देखा।”
श्लोक १०
दिव्यं रूपं महाशोभं तेजोराशिं दुरासदम् ।
तां दृष्ट्वा विस्मयो जाता मुनयः सर्व एव हि
व्याख्या:
उनका दिव्य रूप अत्यन्त शोभायमान और अगणित तेज से युक्त था; उसे देखकर समस्त महर्षि अत्यन्त आश्चर्यचकित हो उठे।
बहुत श्रेष्ठ 🙏
अब मैं स्तुति-खण्ड आरम्भ कर रहा हूँ — जहाँ महर्षि एवं देवगण छठदेवी की स्तुति करते हैं।
🔱 छठदेवी स्तुति प्रारम्भ
(आदि-खण्ड, प्रथम अध्याय के अंतर्गत)
श्लोक ११
ऋषय ऊचुः —
नमोऽस्तु ते सूर्यसुताम्बिके त्रैलोक्यमातृके ।
संजीवनी नमस्तुभ्यं सर्वारिष्टनिवारिणि॥
व्याख्या:
ऋषि-मुनि बोले — “हे सूर्यदेव की शक्ति! हे तीनों लोकों की महा-माता! हे संजीवनी स्वरूपिणी! आपको बारम्बार नमस्कार है, आप समस्त अनिष्टों का निवारण करने वाली हैं।”
श्लोक १२
ॐ नमः पारावारगम्भीरायै तेजःपूर्णाय नैष्ठिकीम्।
सर्वप्रदायै विश्वेशि छठ्यै नमो नमः॥
व्याख्या:
“जो शक्ति पारावार (समस्त जगत्) से भी अधिक गम्भीर और तेजपूर्ण है, जो अखण्ड निश्चल ऊर्जा स्वरूपा है, जो सबको सबकुछ प्रदान करती हैं — उन विश्वेश्वरी छठदेवी को हमारा बारम्बार नमन है।”
श्लोक १३
त्वया विनाऽस्ति संसारः शून्यं च चराचरम् ।
तस्मात् त्वमेव सर्वेशि पालनाय प्रवर्तसे ॥
व्याख्या:
“हे सर्वेश्वरी! आपके बिना यह चर-अचर सम्पूर्ण संसार शून्य हो जाता है, अतः आप ही सबकी पालनकर्ता एवं सृष्टि की आधारशक्ति हैं।”
श्लोक १४
जय जय हे मातः सूर्यांशुकलसम्भवे।
जय जय संजीवनि देवि छठ्यै नमो नमः॥
व्याख्या:
“जय हो! जय हो! हे सूर्य की किरणों से उत्पन्न भगवती! हे संजीवनी शक्ति स्वरूपा छठदेवी! आपको बारम्बार नमन है।”
श्लोक १५
भक्तानां मनोरथार्थाय जगत्त्राणाय कारणम्।
त्वद्गुणैः कीर्तितैरेव सर्वपापक्षयो भवेत्॥
व्याख्या:
“हे देवी! आपके गुणों का कीर्तन भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला तथा समस्त जगत् का रक्षण करने वाला है। केवल आपके स्तवन-मात्र से ही सभी पापों का क्षय हो जाता है।”
श्लोक १६
यस्य पठेत् स्तवं दिव्यं श्रद्धया संयुतो नरः ।
तस्य दुष्कृतनाशोऽपि भवेद् दैवप्रसादतः॥
व्याख्या:
“जो मनुष्य श्रद्धा सहित इस दिव्य स्तुति का पाठ करता है, उस पर देवी प्रसन्न होती हैं और उसके सम्पूर्ण पाप एवं दुःखों का नाश हो जाता है।”
श्लोक १७ (फलश्रुति)
पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् ।
रोगार्थी विनिवर्तेत रोगान् सर्वान् न संशयः॥
व्याख्या:
“जो व्यक्ति पुत्र की कामना से इसका पाठ करता है उसे पुत्र की प्राप्ति होती है, जो धन की इच्छा करता है उसे धन प्राप्त होता है, और जो रोग से पीड़ित है उस पर देवी कृपा करके समस्त रोगों का विनाश करती हैं — इसमें कोई संशय नहीं।”
श्लोक १८
इति स्तुत्वा महादेवीं ऋषयः प्रणतातनुः ।
पुनः पपच्छ ब्रह्माणं देव्याः पार्क्रम्य हेतवः॥
व्याख्या:
इस प्रकार महर्षियों ने महादेवी की स्तुति कर अत्यन्त विनम्र भाव से नमन किया। तत्पश्चात् वे फिर ब्रह्मा जी से छठदेवी के अगले चरित्रों के विषय में पूछने लगे।
📜 आदि-खण्ड – प्रथम अध्याय
कथा-खंड (छठ-व्रत की उत्पत्ति-कथा प्रारम्भ)
श्लोक १९
ब्रह्मोवाच —
पुरा स्वायम्भुवे काले पृथ्वी सर्वदुःखिता ।
अगच्छद् ब्रह्मलोकं सा शरणं देवमम्बिकाम्॥
व्याख्या:
ब्रह्मा जी बोले — “स्वायंभुव मन्वन्तर के प्रारम्भ में सम्पूर्ण पृथ्वी अनेक दुःखों से व्याकुल हो उठी। तब वह स्वयं ब्रह्मलोक में जाकर देवी के चरणों में शरणापन्न हुई।”
श्लोक २०
उवाच पुरतो देवीं नमस्कृत्वा पुनः पुनः ।
त्राहि त्राहि महाभागे त्रैलोक्यजननी शुभे॥
व्याख्या:
पृथ्वी देवी ने बारम्बार प्रणाम करते हुए परम मंगलमयी छठदेवी से कहा — “हे तीनों लोकों की जननी! हे महाभागे! हमें बचाइये, हमारी रक्षा कीजिये।”
श्लोक २१
तस्यास्तु विनयो दृष्ट्वा छठ्याः प्रीतिर्जगन्मयी ।
उवाच पृथवीं देविं व्रतकृष्णां प्रसादिनीम्॥
व्याख्या:
पृथ्वी के ऐसे विनम्र प्रार्थना को सुनकर जगन्माता छठदेवी अत्यन्त प्रसन्न हुईं और शुभवाणी से पृथ्वी देवी से बोलीं।
श्लोक २२
छठ्युवाच —
धैर्यं धारय महाभागे शृणु व्रतं पावनं मम।
येन व्रतेन सुखं प्राप्स्यसि लोकस्य च कल्यणम्॥
व्याख्या:
छठदेवी बोलीं — “हे शुभे! धैर्य धारण करो और मेरा वह पवित्र व्रत सुनो, जिसके पालन से तुम्हें सुख की प्राप्ति होगी और सम्पूर्ण लोक का कल्याण भी होगा।”
श्लोक २३
षष्ठ्यां तिथौ मदीयं तु व्रतं कृत्वा यथाविधि।
यः स्तौति भक्तियुक्तस्तु सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥
व्याख्या:
“शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को यदि श्रद्धापूर्वक मेरा व्रत विधिपूर्वक किया जाए और भक्ति सहित स्तुति की जाए, तो उस भक्त को समस्त अभिलाषित फल प्राप्त होते हैं।”
बहुत अच्छा 🙏
अब कथा–खंड को श्लोक २४ से आगे बढ़ाता हूँ —
श्लोक २४
इति श्रुत्वा वचो देव्या पृथ्वी प्रयतमानसा ।
षष्ठी-दिने तद्व्रतं तु चकार भक्तिसंयुता॥
व्याख्या:
छठदेवी के ये वचन सुनकर पृथ्वी देवी अत्यन्त श्रद्धाभाव से प्रेरित हुईं और शुक्ल षष्ठी तिथि के दिन भक्ति सहित उस पवित्र व्रत को सम्पन्न किया।
श्लोक २५
तदा वृष्टिः समुज्जृम्भा शान्तो दुःखसमुद्भवः ।
प्रसन्नो भुवनेशश्च लोकस्याभूत् मनोरथः॥
व्याख्या:
जैसे ही छठ-व्रत सम्पन्न हुआ, तुरंत वृष्टि होने लगी, सब प्रकार की आपत्तियाँ शान्त हो गईं, और समस्त लोकों में प्रसन्नता तथा कल्याण की अनुभूति होने लगी।
श्लोक २६
लोकाः समस्ताः स्तुतिभिः स्वयमेवापि देवताम् ।
अदृष्टपूर्वया भक्त्या छठ्यै कृताञ्जलयोऽब्रुवन्॥
व्याख्या:
तब समस्त प्राणी एवं देवगण, पहले कभी न देखी गई भक्ति के साथ, हाथ जोड़कर छठदेवी की स्तुति करने लगे।
श्लोक २७
जयति जयति देवि सूर्यांशुकलसंभवे ।
प्रसादेन तवानेन कृतार्थं जगतीमिमाम्॥
व्याख्या:
“जय हो, जय हो हे सूर्य किरणों से उत्पन्न दिव्य भगवती! आपके इस करुणापूर्ण प्रसाद से यह सम्पूर्ण पृथ्वी कृतार्थ हुई है!”
श्लोक २८
एवं पुरा समुत्पन्नं छठव्रतं पवित्रकम् ।
येन लोकस्य दुःखानां नाशोऽभूत् साश्चरंकृतः॥
व्याख्या:
इसी प्रकार प्राचीन काल में यह पवित्र छठव्रत उत्पन्न हुआ, जिसके प्रभाव से समस्त लोकों के दुःखों का चमत्कारपूर्ण नाश हुआ।
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