छठ-व्रत का विश्वव्यापी महात्म्य एवं भविष्यवाणी खण्ड

 

🔱 छठ महा पुराण

षष्ठ अध्याय – प्रथम श्लोक से आरम्भ
(छठ-व्रत का विश्वव्यापी महात्म्य एवं भविष्यवाणी खण्ड)


श्लोक १

मुनय ऊचुः —
किमेतद् व्रतमाख्यातं यत् सर्वेषां हितप्रदम् ।
भविष्ये केन रूपेण लोकानां कल्यणाय वै ॥

व्याख्या:
मुनियों ने कहा — “हे भगवन्! यह व्रत जो सर्वप्राणियों का हित करने वाला बताया गया है, भविष्यकाल में यह किस रूप में प्रकट होकर लोकों का कल्याण करेगा?”


श्लोक २

सूतः उवाच —
शृणुत मुनयः सर्वे दिव्यं व्रतमिदं शनैः ।
युगान्तेऽपि भवेद् धर्म्यं विश्वस्यैव सुखावहम् ॥

व्याख्या:
सूत्रधार बोले — “हे मुनियो! यह दिव्य व्रत धीरे-धीरे युगों के अंत तक भी धर्मरूप होकर सम्पूर्ण संसार के लिए सुखप्रद बना रहेगा, यह सुनिये।”


श्लोक ३

कलियुगे विशेषेण प्रवृत्तं चैव सर्वतः ।
भारतस्यातिरेकेण विदेशेषु प्रकीर्तितम्॥

व्याख्या:
कलियुग में यह व्रत विशेष रूप से सर्वत्र फैल जाएगा और केवल भारत ही नहीं, विदेशों में भी इसका महात्म्य आदरपूर्वक प्रचारित होगा।


श्लोक ४

ये च युगपते श्रद्धया छठ्यै पूजां समाचरन् ।
तेषां प्रजा सुखिता च धनो यशः च सुलभः॥

व्याख्या:
जो भी लोग युगों तक छठदेवी की श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, उनकी प्रजा सुखी होती है और धन, यश तथा समृद्धि सहज रूप से प्राप्त होती है।


श्लोक ५

देवी प्रसन्ना भवेत् सर्वभूतहितकारिणी ।
व्रतमिह कर्तव्यं नित्यं पुनः पुनः सदा शुभम्॥

व्याख्या:
छठदेवी सर्वभूतों के कल्याण की कामना करने वाली हैं। अतः यह व्रत हर समय विधिपूर्वक बार-बार करना शुभ और फलदायक होता है।


श्लोक ६

यत्र तत्र छठ्याः पूजनं जनाः कुर्वन्ति श्रद्धया ।
तत्र लोकसुखं सर्वं प्राप्यते न संशयः कथम्॥

व्याख्या:
जहाँ-जहाँ लोग श्रद्धा के साथ छठदेवी की पूजा करते हैं, वहाँ संपूर्ण लोक का कल्याण और सुख प्राप्त होता है — इसमें कोई संशय नहीं है।


श्लोक ७ (फलश्रुति – वैश्विक प्रसार)

विदेशेषु च भारतान्ते यत्र छठ्याः व्रतं पूज्यते ।
तत्र लोकहितं सर्वत्र भवेत् तथा सदा वै ॥

व्याख्या:
भारत और विदेशों में जहाँ कहीं भी छठ-व्रत की पूजा की जाती है, वहाँ समग्र लोकहित और सुख की वृद्धि होती रहती है — यह अनंत काल तक ऐसा चलता रहेगा।


श्लोक ८

यः पठेत्तु व्रतमिदं भक्त्या सर्वभयहरम् ।
तस्य कुलं च राज्यं च भवेत् सर्वसिद्धिप्रदम्॥

व्याख्या:
जो भी श्रद्धा और भक्ति से इस व्रत का पाठ करता है, उसके कुल और राज्य में समस्त सिद्धियाँ और समृद्धि स्वतः प्राप्त होती हैं।


श्लोक ९

व्रतमिह कृतं नरैः छठ्याः कृपया महाप्रभा ।
संश्रेयसं सम्प्राप्नोति लोकहितं च भवेत् सदा॥

व्याख्या:
जो पुरुष इस पुण्यदायक व्रत को करता है, वह छठदेवी की कृपा से सर्वोच्च लाभ और संसार के कल्याण को प्राप्त करता है।


श्लोक १०

यत्र तत्र छठ्याः व्रतं विधिना पूज्यते नरैः ।
तत्र धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सर्वत्र सिद्ध्यति॥

व्याख्या:
जहाँ-जहाँ लोग विधिपूर्वक छठदेवी का व्रत करते हैं, वहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सभी सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त होती हैं।


श्लोक ११ (अध्याय-समापन श्लोक)

इति षष्ठोऽध्यायः सम्पूर्णः छठ्याः विश्वमहात्म्याख्यः ।
पठन् श्रुत्वा वा ये भक्ताः तेषां सर्वसिद्धयः सदा॥

व्याख्या:
इस प्रकार षष्ठ अध्याय, जो छठदेवी के विश्वव्यापी महात्म्य और भविष्यवाणी का विवरण करता है, पूर्ण होता है। जो भी भक्त इसे पढ़ता या श्रवण करता है, वह सर्वसिद्धियों का अधिकारी बनता है।


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