छठ महा पुराण – संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या संग्राहक रूप




छठ महा पुराण – संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या संग्राहक रूप


अध्याय 1 – प्रारंभिक स्तुति (Stuti of Chhathi Maiya)

संस्कृत:

ॐ छठ्यै नमः।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

हिन्दी:
“ओं छठ्यै नमः। जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति रूप में प्रतिष्ठित हैं, उनका बार-बार नमन।"


अध्याय 2 – राम-सीता एवं छठ-व्रत (Ram & Sita and Chhath Vrat)

संस्कृत:

शौनक उवाच —
रामस्य वनवासेऽन्ते कृतं किमिदमादरात्।

हिन्दी:
“शौनक ऋषि बोले — जब भगवान राम का वनवास समाप्त हुआ, तब उन्होंने कौन-सा ऐसा कार्य किया जिससे उन्हें राज्यलक्ष्मी और प्रजा का सुख प्राप्त हुआ?”


संस्कृत:

वैश्यंपायन उवाच —
छठ्याः पुण्यं महाव्रतं चकार भक्तिसंयुता॥

हिन्दी:
“वैश्यंपायन ऋषि बोले — उसने छठदेवी का महापुण्य व्रत भक्ति सहित किया।”


संस्कृत:

स्नात्वा तु पुण्यतोयेन कुर्वाणेव नियंक्तया।
सूर्यदर्शनकाल्ये सा ददौ अर्घ्यं यथाविधि॥

हिन्दी:
“स्नान कर, पवित्र जल से शुद्ध होकर, सूर्यदर्शन के समय विधिपूर्वक अर्घ्य दिया।”


अध्याय 3 – द्रौपदी एवं छठ-व्रत (Draupadi & Chhath Vrat)

संस्कृत:

जनमेजय उवाच —
पञ्चभ्यः पाण्डवेभ्यः पूर्वं द्रौपदी किं व्रतं कृतम्?

हिन्दी:
“जनमेजय ने पूछा — पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी ने कौन-सा व्रत किया था जिससे समस्त दुःख समाप्त हुए और श्रेष्ठ लोक प्राप्त हुए?”


संस्कृत:

वैश्यंपायन उवाच —
तत्रैव छठ्याः व्रतं कृतं भक्तिसंयुतम्॥

हिन्दी:
“वैश्यंपायन बोले — वहां ही छठदेवी का व्रत भक्ति सहित किया गया।”


अध्याय 4 – छठ व्रत का नियम और अनुशासन (Vrat Rules & Discipline)

संस्कृत:

मुनय उवाच —
कथयतां भद्रराज व्रतस्य विधानं यथार्थम्।

हिन्दी:
“मुनियों ने कहा — हे भद्रराज! कृपया छठ व्रत का सही विधान बताइए, जिसे प्रतिदिन पालन करने पर शुभलाभ प्राप्त होते हैं।”


संस्कृत:

प्रथमं स्नात्वा पुण्यजलैः सप्तमी दिने व्रतम्।
अर्घ्यं दत्वा दिवाकर्यै स्तुत्यं छठ्यै श्रद्धया च॥

हिन्दी:
“सबसे पहले सातवीं के दिन स्नान करके पवित्र जल से शुद्ध हो जाएँ। सूर्यदेव को अर्घ्य दें और श्रद्धा के साथ छठदेवी की स्तुति करें।”


संस्कृत:

अनन्यभक्त्या कुर्याद् उपवेशं दिवाकरसम्।
द्रष्ट्वा सूर्यसिंहं नित्यं पूजनं सदा शुभम्॥

हिन्दी:
“भक्तिभाव से सूर्य के सामने बैठकर प्रतिदिन पूजन करना शुभ है।”


संस्कृत:

भोजनं सरलं पचेत् प्रातराग्रे स्वच्छतया।
नित्यं दधि, फलानि, शुद्धं जलं च समर्पयेत्॥

हिन्दी:
“भोजन सरल और स्वच्छ हो। प्रातः दही, फल और शुद्ध जल अर्पित करें।”


अध्याय 5 – विशेष अवसर एवं फलश्रुति (Special Times & Fruits of Vrat)

संस्कृत:

सप्तमी, अष्टमी च प्रातःकाले सूर्यप्रकाशे।
अर्घ्यं दत्वा व्रतम् पूज्यं करोतु नर-स्त्री हि॥

हिन्दी:
“सातवीं और आठवीं तिथि के प्रातः सूर्य के प्रकाश में अर्घ्य अर्पित कर पुरुष और स्त्री दोनों को व्रत करना चाहिए।”


संस्कृत:

वर्षा ऋतु वा शरदः वा विशेषः न भूयात् कदाचि।
छठ्यै पूजितोऽयं व्रतः लोकहिताय सदा शुभः॥

हिन्दी:
“वर्षा ऋतु हो या शरद ऋतु, कभी भी यह व्रत किया जा सकता है; यह हमेशा कल्याणदायक है।”


अध्याय 6 – सप्तम एवं अष्टम अध्याय का नियम एवं अनुशासन

संस्कृत:

उत्तिष्ठेद् द्रष्टुं सूर्यं प्रातःकाले विनियोगतः।
अर्घ्यं दत्वा छठ्यै सदा भक्त्या हृदयसमाहितः॥

हिन्दी:
“प्रतिदिन प्रातः उठकर सूर्य का दर्शन करें और अर्घ्य अर्पित करते समय पूरी भक्ति और मनोयोग के साथ छठदेवी की पूजा करें।”


संस्कृत:

उपवासं कुर्याद् नरः स्त्री च नित्यं शुद्धिपूर्वकम्।
केवलं जलं खादित्वा सुखं लभेत् परमम्॥

हिन्दी:
“पुरुष और स्त्री दोनों को प्रतिदिन उपवास करना चाहिए, शुद्धि के नियम का पालन करते हुए। इस दौरान केवल शुद्ध जल का सेवन करें और परम सुख की प्राप्ति होती है।”


संस्कृत:

अर्घ्यदानं प्रातराग्रे दिवाकर्यैः सदा शुभम्।
छठ्यै नमस्कृत्य च व्रतं सम्पूर्णं भवेत्॥

हिन्दी:
“सूर्यदेव को प्रातः काल में अर्घ्य अर्पित करना शुभ है। छठदेवी को नमस्कार करने से व्रत पूर्ण होता है और उसका पूर्ण फल प्राप्त होता है।”


अध्याय 7-9 – फलश्रुति एवं उपसंहार

संस्कृत:

यः पठेत्तु व्रतमिदं श्रद्धया नित्यं प्रतिदिनम्।
तस्य कुलं च राज्यं च भवेत् सर्वसिद्धिप्रदम्॥

हिन्दी:
“जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ इस व्रत का प्रतिदिन पालन करता है, उसका कुल और राज्य सभी प्रकार की सिद्धियों और समृद्धि से युक्त हो जाता है।”


संस्कृत:

अर्घ्यं दत्वा दिवाकर्यै व्रतमिह सम्पूर्णं भवेत्।
छठ्यै नमस्कृत्य भक्त्या फलप्राप्तिः सदा स्थिरः॥

हिन्दी:
“सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करने और छठदेवी को श्रद्धा और भक्ति सहित नमस्कार करने से व्रत पूर्ण होता है और उसका फल स्थायी रूप से प्राप्त होता है।”


संस्कृत:

इति नवमः अध्यायः समाप्तः, सम्पूर्णं छठ्याः महात्म्यम्।
पठन् वा श्रुत्वा ये भक्ताः तेषां सर्वसिद्धयः सदा स्थिराः॥

हिन्दी:
“इस प्रकार नवम अध्याय, जिसमें छठदेवी के महात्म्य और व्रत के सम्पूर्ण लाभ का उपसंहार प्रस्तुत किया गया, समाप्त होता है। जो भी भक्त इसे पढ़ता या सुनता है, वह सर्वसिद्धियों का अधिकारी बनता है।”


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