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Showing posts from January, 2026

सरस्वती पूजा – शिक्षा, संस्कार और छात्र चेतना का महापर्व

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 सरस्वती पूजा – शिक्षा, संस्कार और छात्र चेतना का महापर्व Sandeep Kumar Dubey Advocate, Supreme Court of India.                                      सरस्वती पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की वह जीवंत परंपरा है जो शिक्षा, संस्कार और चरित्र निर्माण को समाज के केंद्र में स्थापित करती है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि विद्या केवल पुस्तकों का ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली शक्ति है। सरस्वती माता ज्ञान, बुद्धि, विवेक, वाणी और सृजन की देवी हैं। उनका श्वेत वस्त्र पवित्रता का, वीणा सृजनशीलता का, पुस्तक ज्ञान का और हंस विवेक का प्रतीक है। बिहार में सरस्वती पूजा को विशेष रूप से छात्रों का महापर्व माना जाता है। यहाँ यह पूजा केवल मंदिरों या विद्यालयों तक सीमित नहीं, बल्कि हर गली, हर मोहल्ले और हर छात्र के हृदय में बसती है। विद्यार्थी स्वयं पंडाल बनाते हैं, प्रतिमा स्थापित करते हैं, कार्यक्रम आयोजित करते हैं और पूरे समाज को एकता के सूत्र में बा...

Saraswati Puja: The Festival of Knowledge, Culture, and Student Consciousness

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Saraswati Puja: The Festival of Knowledge, Culture, and Student Consciousness By Sandeep Kumar Dubey, Advocate, Supreme Court of India Saraswati Puja is not merely a religious ritual; it is a living celebration of knowledge, culture, and moral consciousness. It represents the soul of Indian civilization where education is regarded as sacred and learning is considered a divine pursuit. Maa Saraswati, the goddess of wisdom, speech, intellect, and arts, symbolizes purity of thought, clarity of expression, and enlightenment of the mind. She is depicted in white attire, holding a veena, a book, and a rosary, seated on a lotus or a swan. Each symbol carries deep meaning. White represents purity, the veena symbolizes harmony and creativity, the book stands for knowledge, and the swan represents wisdom and discrimination between right and wrong. Maa Saraswati guides humanity from ignorance to enlightenment and from darkness to light. In Bihar, Saraswati Puja holds a unique and powe...

एक बिहारी, सब पर भारी : नितिन नवीन जी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना – राष्ट्र के लिए गौरव का क्षण

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एक बिहारी, सब पर भारी : नितिन नवीन जी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना – राष्ट्र के लिए गौरव का क्षण — संदीप कुमार दुबे, एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया “एक बिहारी, सब पर भारी” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि बिहार की उस परंपरा का प्रतीक है, जिसने हमेशा देश को नेतृत्व, साहस और संकल्प दिया है। आज जब श्री नितिन नवीन जी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं, तो यह क्षण केवल एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए गौरव और प्रेरणा का विषय है। बिहार की धरती बुद्ध, महावीर, चाणक्य और अशोक जैसे महान व्यक्तित्वों की जन्मस्थली रही है। यह वही भूमि है जिसने सदैव भारत को दिशा देने वाले नेतृत्व को जन्म दिया। नितिन नवीन जी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना उसी गौरवशाली परंपरा की निरंतरता है। यह सिद्ध करता है कि बिहार की मिट्टी में आज भी नेतृत्व की वही शक्ति और सामर्थ्य विद्यमान है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन में देश जिस आत्मनिर्भर, सशक्त और विकसित भारत की ओर अग्रसर है, उसमें नितिन नवीन जी का अनुभव, ऊर्जा और संगठनात्मक क्षमता नई गति प्रदान करेगी। उनका चयन यह दर्शात...

सतत विद्युत प्रणाली का भविष्य”

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वक्ता : संदीप कुमार दुबे अधिवक्ता एवं मध्यस्थ, सर्वोच्च न्यायालय, भारत आदरणीय मुख्य अतिथि, सम्मानित विशिष्ट अतिथिगण, माननीय वक्तागण, और इस गरिमामयी संगोष्ठी में उपस्थित सभी महानुभावों को मेरा सादर प्रणाम। आज “सतत विद्युत प्रणाली का भविष्य” विषय पर विधिक दृष्टिकोण से अपने विचार प्रस्तुत करना मेरे लिए गर्व और सौभाग्य की बात है। मैं इस विषय को अपनी संस्कृति और आस्था से जोड़ते हुए विशेष रूप से छठ पर्व की भावना के साथ रखना चाहता हूँ, क्योंकि छठ पर्व प्रकृति, सूर्य, जल और ऊर्जा के प्रति भारतीय चेतना का जीवंत प्रतीक है। छठ पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति का उपयोग नहीं, प्रकृति का सम्मान ही सच्चा विकास है। आज जिसे हम आधुनिक भाषा में “सतत ऊर्जा” कहते हैं, उसे हमारी परंपरा ने हजारों वर्षों पहले छठ पर्व के माध्यम से जीवन में उतार दिया था। सूर्य को अर्घ्य देना केवल आस्था नहीं है, वह ऊर्जा के मूल स्रोत के प्रति कृतज्ञता और संतुलन का संदेश है। साथियों, सतत ऊर्जा केवल तकनीकी विषय नहीं है, यह हमारा संवैधानिक, विधिक और नैतिक कर्तव्य है। हमारा संविधान कहता है – अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक...

“RSB LEGAL CHAMBER” – A New Law Firm Dedicated to Mediation and Conflict Resolution

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 Chairman of Chhathi Maiya Foundation Announces the Launch of “RSB LEGAL CHAMBER” – A New Law Firm Dedicated to Mediation and Conflict Resolution New Delhi: Mr. Sandeep Kumar Dubey, Chairman of the Chhathi Maiya Foundation and a practicing Advocate, has formally announced the establishment of his new law firm, RSB LEGAL CHAMBER, with a special focus on Mediation, Conflict Resolution, Legal Consultancy, and Advocacy. The launch of RSB Legal Chamber reflects a progressive vision of justice—one that goes beyond litigation and emphasizes dialogue, understanding, and peaceful settlement of disputes. Mr. Dubey stated that in today’s society, legal conflicts are increasing rapidly, but courts alone cannot be the only answer. Mediation and Alternative Dispute Resolution (ADR) are essential tools to create faster, fairer, and more humane solutions. “Justice is not only about winning cases in court; it is about restoring harmony, rebuilding trust, and finding solutions that prote...

Future of Sustainable Power System

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Future of Sustainable Power System (By Sandeep Kumar Dubey, Advocate, Supreme Court of India Chairman, Chhathi Maiya Foundation) The world today stands at a crucial crossroads. Our energy demands are increasing rapidly, while traditional sources such as coal, oil, and gas are not only limited but also harmful to the environment. In this context, the Sustainable Power System is no longer a choice; it is a necessity for the survival and progress of humanity. A Sustainable Power System refers to an energy framework that fulfills present needs without compromising the ability of future generations to meet their own requirements. It is based on clean and renewable sources such as solar energy, wind power, hydropower, bio-energy, and green hydrogen. These sources are abundant, environmentally friendly, and capable of supporting long-term development. The future of energy lies in decentralization. Power generation will no longer remain confined to large power plants. Every rooftop...

“मुझे ऐसे युवा चाहिए जिनमें लोहे की तरह मजबूत इच्छाशक्ति हो।”

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युवा दिवस पर संकल्प : स्वामी विवेकानंद के सपनों का भारत — संदीप कुमार दुबे एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया Chairman, छठी मैया फाउंडेशन स्वामी विवेकानंद जयंती पर मनाया जाने वाला युवा दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को जगाने का अवसर है। विवेकानंद जी ने कहा था – “मुझे ऐसे युवा चाहिए जिनमें लोहे की तरह मजबूत इच्छाशक्ति हो।” उनका यह संदेश आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है, जब भारत विश्व मंच पर तेजी से आगे बढ़ रहा है और चुनौतियाँ भी उतनी ही जटिल होती जा रही हैं। भारत को युद्ध नहीं चाहिए, पर भारत को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। क्योंकि इतिहास सिखाता है कि युद्ध कभी भी थोपा जा सकता है। इसलिए हमारी तैयारी आक्रामकता के लिए नहीं, आत्मरक्षा, स्वाभिमान और शांति की रक्षा के लिए होनी चाहिए। यह तैयारी केवल सेना की नहीं, पूरे समाज और विशेषकर युवाओं की होनी चाहिए। युवा केवल देश की शक्ति नहीं, बल्कि उसकी ढाल और उसकी दिशा दोनों हैं। युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, वह विचारों में, तकनीक में, अर्थव्यवस्था में और चरित्र में भी लड़ा जाता है। यदि हमारा युवा जागरूक, अनुशास...

The True Meaning of Achievement: Responsibility Beyond Success

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The True Meaning of Achievement: Responsibility Beyond Success By Sandeep Kumar Dubey Advocate, Supreme Court of India | Chairman, Chhathi Maiya Foundation In today’s fast-paced world, success is often measured by position, power, and possessions. Society tends to define achievement through external symbols—titles, recognition, and material growth. However, the true essence of human achievement lies far beyond these visible markers. Real accomplishment is not about how much one gains, but about how much one contributes. Every individual works not merely to achieve personal success, but to find meaning in their actions. A person’s work becomes meaningful when it brings relief to someone in distress, restores hope to the hopeless, or strengthens the moral fabric of society. Such contributions may not always make headlines, but they leave a lasting imprint on humanity. Achievement, in its purest form, is rooted in responsibility. When work is guided by conscience, compassion, ...

युवाओं को छठी मैया का व्रत सिखाएँगे, ताकि वे टूटते परिवारों को जोड़ सकें

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युवाओं को छठी मैया का व्रत करना सिखाएँगे, ताकि वे टूटते परिवारों को जोड़ सकें — संदीप कुमार दुबे Chairman, छठी मैया फाउंडेशन छठ केवल सूर्योपासना का पर्व नहीं है, यह रिश्तों को बचाने की एक महान साधना है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में संतुलन, संयम, धैर्य और समर्पण कितना आवश्यक है। जिस प्रकार हम छठ में शुद्ध मन, व्रत, त्याग और कृतज्ञता के साथ छठी मैया और प्रकृति को नमन करते हैं, उसी प्रकार हमें अपने रिश्तों के लिए भी तप, धैर्य और समर्पण का भाव अपनाना चाहिए। आज समाज की सबसे बड़ी चिंता टूटते हुए परिवार हैं। रिश्ते आसानी से बनते हैं, पर उतनी ही आसानी से टूट भी जाते हैं। अहंकार, क्रोध, अविश्वास और संवाद की कमी विवाह और परिवार की नींव को कमजोर कर रही है। इसका सबसे गहरा प्रभाव बच्चों और युवाओं पर पड़ता है। जब युवा अपने आसपास टूटते परिवारों को देखता है, तो उसका विश्वास रिश्तों से उठने लगता है और वह विवाह जैसी पवित्र संस्था से डरने लगता है। इसीलिए हमारा संकल्प है – “हम युवाओं को छठी मैया का व्रत करना सिखाएँगे, ताकि वे टूटते परिवारों को जोड़ सकें।” छठ युवाओं को केवल पूजा-पाठ नहीं सिखात...

“ईश्वर, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?”

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ईश्वर : माँगने से पहले समर्पण की सीख इंसान जब ईश्वर के सामने खड़ा होता है, तो उसके होंठों पर सबसे पहले “माँग” आ जाती है। हे ईश्वर, दुख दूर कर दो… हे ईश्वर, संकट से बचा लो… हे ईश्वर, सफलता दे दो… हे ईश्वर, मेरी रक्षा करो… पर ईश्वर के दर पर झुका हुआ इंसान सिर्फ माँगने के लिए नहीं आया होता, वह अनजाने में ही अपने पूरे अस्तित्व को अर्पण करने आया होता है। ईश्वर को भोग नहीं चाहिए, उन्हें भाव चाहिए। उन्हें दिखावा नहीं चाहिए, उन्हें सच्चाई चाहिए। उन्हें शब्दों की पूजा नहीं, कर्मों की पवित्रता चाहिए। जब कोई माँ अपने बच्चे के लिए रात-रात भर जागती है, तो वह ईश्वर की पूजा कर रही होती है। जब कोई बेटा अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बनता है, तो वह ईश्वर के चरणों में सिर रख रहा होता है। जब कोई इंसान दूसरे के दर्द को अपना समझता है, तो वहीं ईश्वर प्रकट हो जाते हैं। ईश्वर कभी कुछ माँगते नहीं, वह सिर्फ देते हैं। सूरज की तरह, जो बिना भेदभाव सबको उजाला देता है। हवा की तरह, जो बिना शर्त सबको जीवन देती है। पानी की तरह, जो सबकी प्यास बुझाता है। ईश्वर हमें सिखाते हैं – माँगने वाले नहीं, देने वाले बनो।...

रात की ठंड में संवेदना की लौ

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ठंड की रात में भी जनसेवा की गर्माहट रात के अंधेरे में गार्डों के लिए हीटर लेकर पहुँचे रात की ठंड में संवेदना की लौ — एक उदाहरण, जो प्रेरणा बने जब अधिकांश लोग रात की ठंड में अपने घरों की गर्माहट में सिमट जाते हैं, तब कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो दूसरों की ठिठुरन को अपनी ज़िम्मेदारी मानते हैं। मालवीय नगर के विधायक Satish Upadhyay का ठंडी रात में सुरक्षा गार्डों के लिए हीटर लेकर पहुँचना इसी संवेदनशील नेतृत्व का उदाहरण है। यह घटना केवल हीटर वितरण की नहीं है; यह मानवीय सरोकार, कर्तव्यबोध और जमीनी नेतृत्व की कहानी है। सुरक्षा गार्ड—जो रात-दिन हमारी सुरक्षा में तैनात रहते हैं—अक्सर समाज की नज़र से ओझल रह जाते हैं। उनकी ज़रूरतों को पहचानना और समय पर सहायता पहुँचाना बताता है कि नेतृत्व यदि चाहे तो राजनीति को सेवा का स्वरूप दे सकता है। इस पहल का संदेश स्पष्ट है—जनसेवा समय, मौसम या सुविधा की मोहताज नहीं होती। जब जनप्रतिनिधि स्वयं मैदान में उतरते हैं, संवाद करते हैं, और समाधान लेकर पहुँचते हैं, तो भरोसा मजबूत होता है। ठंड की  रात, हीटर सिर्फ गर्मी का साधन नहीं...

कर्म की सार्थकता : उपलब्धि नहीं, उत्तरदायित्व

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कर्म की सार्थकता : उपलब्धि नहीं, उत्तरदायित्व — संदीप कुमार दुबे अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय | चेयरमैन, छठी मइया फ़ाउंडेशन आज के समय में मनुष्य की सफलता को अक्सर पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से मापा जाता है। समाज ने उपलब्धि की परिभाषा को इतना संकुचित कर दिया है कि कर्म का वास्तविक उद्देश्य कहीं पीछे छूटता जा रहा है। जबकि सत्य यह है कि मनुष्य अपने कर्मों से केवल सफलता नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष और सामाजिक उत्तरदायित्व की पूर्ति चाहता है। कर्म का मूल्य उसकी चमक में नहीं, उसके प्रभाव में होता है। यदि किसी व्यक्ति के कार्य से किसी का जीवन आसान हुआ, किसी को न्याय मिला, किसी परिवार में फिर से विश्वास लौटा या समाज में सकारात्मक परिवर्तन आया—तो वही सच्ची उपलब्धि है। यह उपलब्धि न तो मंच की मोहताज होती है, न ही प्रशंसा की। आज आवश्यकता है कि हम कर्म को प्रतिस्पर्धा नहीं, सेवा के रूप में देखें। जब कर्म स्वार्थ से मुक्त होकर समाज के लिए समर्पित होता है, तब वह व्यक्ति को भी ऊँचा उठाता है और समाज को भी सशक्त बनाता है। ऐसे कर्म ही आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनते हैं। एक अधिवक्ता के रूप ...

यह वर्ष नए संकल्पों का है

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यह वर्ष नए संकल्पों का है  लेखक: संदीप दुबे अधिवक्ता – सर्वोच्च न्यायालय चेयरमैन – छठी मइया फ़ाउंडेशन नया वर्ष केवल कैलेंडर का पन्ना बदलने का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और आत्मनिर्माण का अवसर होता है। यह वह समय है जब मनुष्य अपने अतीत से सीख लेकर भविष्य की दिशा तय करता है। यह वर्ष हम सभी के लिए नए संकल्पों, नई ऊर्जा और नई चेतना का प्रतीक बने—यही कामना है। आज का युग केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व का युग है। समाज, संस्कृति और संस्कार—तीनों को साथ लेकर चलना ही सच्ची प्रगति है। जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों को समझता है, तभी राष्ट्र मजबूत होता है। यही भावना छठी मइया की परंपरा भी सिखाती है—त्याग, तप, अनुशासन और लोककल्याण। नए संकल्पों का अर्थ केवल लक्ष्य निर्धारित करना नहीं, बल्कि उन्हें सत्य, संयम और संवेदना के साथ निभाना है। हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम अपने आचरण से समाज को दिशा देंगे, न कि केवल उपदेशों से। आज आवश्यकता है नैतिक नेतृत्व की, पारदर्शिता की और सेवा-भाव से प्रेरित कर्मयोग की। एक अधिवक्ता के रूप में मेरा विश...